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Samveda Mantra 1545

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भर्गः प्रागाथः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
पा꣣हि꣡ विश्व꣢꣯स्माद्र꣣क्ष꣢सो꣣ अ꣡रा꣢व्णः꣣ प्र꣢ स्म꣣ वा꣡जे꣢षु नोऽव । त्वा꣡मिद्धि नेदि꣢꣯ष्ठं दे꣣व꣡ता꣢तय आ꣣पिं꣡ नक्षा꣢꣯महे वृ꣣धे꣢ ॥१५४५॥

पा꣣हि꣢ । वि꣡श्व꣢꣯स्मात् । र꣣क्ष꣡सः꣢ । अ꣡रा꣢꣯व्णः । अ । रा꣣व्णः । प्र꣢ । स्म꣣ । वा꣡जे꣢꣯षु । नः꣣ । अव । त्वा꣢म् । इत् । हि । ने꣡दि꣢꣯ष्ठम् । दे꣣व꣡ता꣢तये । आ꣣पि꣢म् । न꣡क्षा꣢꣯महे । वृ꣡धे꣢꣯ ॥१५४५॥

Mantra without Swara
पाहि विश्वस्माद्रक्षसो अराव्णः प्र स्म वाजेषु नोऽव । त्वामिद्धि नेदिष्ठं देवतातय आपिं नक्षामहे वृधे ॥

पाहि । विश्वस्मात् । रक्षसः । अराव्णः । अ । राव्णः । प्र । स्म । वाजेषु । नः । अव । त्वाम् । इत् । हि । नेदिष्ठम् । देवतातये । आपिम् । नक्षामहे । वृधे ॥१५४५॥

Samveda - Mantra Number : 1545
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 1;

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Meaning
हे अग्ने ! हे विद्वान् आचार्य ! आप (विश्वस्मात्) सब (अराव्णः) अदानशील, स्वार्थपरायण (रक्षसः) राक्षस-भाव से (पाहि) हमें बचाओ, (वाजेषु) देवासुरसङ्ग्रामों में (नः) हमारी (प्र अव स्म) रक्षा करो। (त्वाम् इत् हि) आपको ही हम (देवतातये) दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए और (वृधे) आगे बढ़ने के लिए (नेदिष्ठम्) सबसे अधिक निकट के (आपिम्) बन्धुरूप में (नक्षामहे) प्राप्त करते हैं ॥२॥
Essence
आचार्य का यह कर्तव्य है कि वह शिष्यों की अन्तरात्मा में होनेवाले देवासुरसङ्ग्रामों में दिव्यभावों की विजय के लिए सहायक हो और स्वार्थ-वृत्तियों को विनष्ट करके परोपकार की वृत्तियाँ उत्पन्न करे ॥२॥ इस खण्ड में परमात्मा और आचार्य के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ पन्द्रहवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
Subject
आगे फिर आचार्य को कहा जा रहा है।

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