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Samveda Mantra 1542

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ त्वा जु꣣ह्वो꣢३꣱म꣡म꣢ घृ꣣ता꣡ची꣢र्यन्तु हर्यत । अ꣡ग्ने꣢ ह꣣व्या꣡ जु꣢षस्व नः ॥१५४२॥

उ꣡प꣢꣯ । त्वा꣢ । जु꣢ह्वः । म꣡म꣢꣯ । घृ꣣ता꣡चीः꣢ । य꣣न्तु । हर्यत । अ꣡ग्ने꣢꣯ । ह꣣व्या꣢ । जु꣣षस्व । नः ॥१५४२॥

Mantra without Swara
उप त्वा जुह्वो३मम घृताचीर्यन्तु हर्यत । अग्ने हव्या जुषस्व नः ॥

उप । त्वा । जुह्वः । मम । घृताचीः । यन्तु । हर्यत । अग्ने । हव्या । जुषस्व । नः ॥१५४२॥

Samveda - Mantra Number : 1542
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 1;

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Meaning
हे (अग्ने) ज्योतिर्मय परमेश ! हे (हर्यत) कमनीय ! (मम) मुझ स्तोता की (घृताचीः) स्नेह से आर्द्र वा तेज से युक्त (जुह्वः) वाणियाँ (त्वा) आपको (उप यन्तु) प्राप्त हों। आप (नः) हमारी (हव्या) आत्मसमर्पणरूप हवियों को (जुषस्व) प्रेम से स्वीकार करो ॥२॥
Essence
श्रद्धा और प्रेम से की गयी परमात्मा की स्तुति अवश्य फलदायक होती है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा को हवि अर्पित करते हैं।

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