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Samveda Mantra 1532

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣢र्मू꣣र्धा꣢ दि꣣वः꣢ क꣣कु꣡त्पतिः꣢꣯ पृथि꣣व्या꣢ अ꣣य꣢म् । अ꣣पा꣡ꣳ रेता꣢꣯ꣳसि जिन्वति ॥१५३२॥

अ꣣ग्निः꣢ । मू꣣र्धा꣢ । दि꣣वः꣢ । क꣣कु꣢त् । प꣡तिः꣢꣯ । पृ꣣थिव्याः꣢ । अ꣡य꣢म् । अ꣣पा꣢म् । रे꣡वा꣢꣯ꣳसि । जि꣢न्वति ॥१५३२॥

Mantra without Swara
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपाꣳ रेताꣳसि जिन्वति ॥

अग्निः । मूर्धा । दिवः । ककुत् । पतिः । पृथिव्याः । अयम् । अपाम् । रेवाꣳसि । जिन्वति ॥१५३२॥

Samveda - Mantra Number : 1532
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 4;

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Meaning
(अग्निः) अग्नि ही, शरीर में (मूर्धा) मस्तिष्क है, क्योंकि मस्तिष्क अग्नि- प्रधान है। यही सूर्य रूप में (दिवः) द्युलोक का (ककुत्) राजा है। (अयम्) यही पार्थिव अग्नि के रूप में (पृथिव्याः) पृथिवी का (पतिः) पालनकर्ता है। अग्नि ही (अपाम्) जलों के (रेतांसि) सूक्ष्म अवयवों को (जिन्वति) भूमि से अन्तरिक्ष की ओर और अन्तरिक्ष से भूमि की ओर प्रेरित करता है अर्थात् वर्षा में कारण बनता है ॥१॥ यहाँ एक अग्नि का अनेक रूप में उल्लेख होने के कारण विषयभेदनिबन्धन उल्लेखालङ्कार है ॥१॥
Essence
अग्नि ही सब चेतन-अचेतन जगत् की स्थिति का कारण है। वही आग, बिजली, सूर्य, जाठराग्नि, प्राणाग्नि, वाडवाग्नि आदि के रूप में अनेक प्रकार से विद्यमान होता हुआ हमारा उपकार करता है, जैसा की श्रुति कहती है—एक॑ ए॒वाग्निर्ब॑हु॒धा समि॑द्धः (ॠ० ८।५८।२) ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २७ क्रमाङ्क पर परमात्मा और सूर्य के पक्ष में की जा चुकी है। यहाँ अग्नि-तत्त्व का महत्त्व वर्णित करते हैं।

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