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Samveda Mantra 1530

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- केतुराग्नेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ न꣡क्ष꣢त्रम꣣ज꣢र꣣मा꣡ सूर्य꣢꣯ꣳ रोहयो दि꣣वि꣢ । द꣢ध꣣ज्ज्यो꣢ति꣣र्ज꣡ने꣢भ्यः ॥१५३०॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । न꣡क्ष꣢꣯त्रम् । अ꣣ज꣡र꣢म् । अ꣣ । ज꣡र꣢꣯म् । आ । सू꣡र्य꣢꣯म् । रो꣣हयः । दि꣣वि꣢ । द꣡ध꣢꣯त् । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । ज꣡ने꣢꣯भ्यः ॥१५३०॥

Mantra without Swara
अग्ने नक्षत्रमजरमा सूर्यꣳ रोहयो दिवि । दधज्ज्योतिर्जनेभ्यः ॥

अग्ने । नक्षत्रम् । अजरम् । अ । जरम् । आ । सूर्यम् । रोहयः । दिवि । दधत् । ज्योतिः । जनेभ्यः ॥१५३०॥

Samveda - Mantra Number : 1530
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 4;

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1 Bhashyas
Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (अग्ने) ज्योतिर्मय, प्रकाशक, जगन्नायक परमात्मन् ! (जनेभ्यः) उत्पन्न प्राणियों के लिए (ज्योतिः) प्रकाश (दधत्) प्रदान करते हुए आपने (नक्षत्रम्) गतिमय, अपनी धुरी पर घूमनेवाले, (अजरम्) सृष्टि के आरम्भ से लेकर अब तक जीर्ण न हुए (सूर्यम्) सूर्य को (दिवि) आकाश में (आरोहयः) चढ़ाया हुआ है ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (अग्ने) राष्ट्रनायक राजन् ! (जनेभ्यः) प्रजाओं के लिए (ज्योतिः) विद्या का प्रकाश और बिजली का प्रकाश (दधत्) प्रदान करते हुए आपने (नक्षत्रम्) गतिमान्, (अजरम्) जीर्णता-रहित (सूर्यम्) विद्या और धर्म के सूर्य को (दिवि) राष्ट्र-गगन में (आरोहयः) चढ़ा दिया है ॥४॥
Essence
जैसे परमेश्वर आकाश में वस्तुतः ही सूर्य को उत्पन्न करता है, वैसे ही जो राजा राष्ट्र में परा विद्या, अपरा विद्या और धर्म का प्रकाश करता है वह भी मानो सूर्य को उत्पन्न करता हैं ॥४॥
Subject
आगे फिर वही विषय है।