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Samveda Mantra 1528

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- केतुराग्नेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢या꣣ गा꣢ आ꣣क꣡रा꣢महै꣣ से꣡न꣢याग्ने꣣ त꣢वो꣣त्या꣢ । तां꣡ नो꣢ हिन्व म꣣घ꣡त्त꣢ये ॥१५२८॥

य꣡या꣢꣯ । गाः । आ꣣क꣡रा꣢महै । आ꣣ । क꣡रा꣢꣯महै । से꣡न꣢꣯या । अ꣣ग्ने । त꣡व꣢꣯ । ऊ꣣त्या꣢ । ताम् । नः꣣ । हिन्व । मघ꣡त्त꣢ये ॥१५२८॥

Mantra without Swara
यया गा आकरामहै सेनयाग्ने तवोत्या । तां नो हिन्व मघत्तये ॥

यया । गाः । आकरामहै । आ । करामहै । सेनया । अग्ने । तव । ऊत्या । ताम् । नः । हिन्व । मघत्तये ॥१५२८॥

Samveda - Mantra Number : 1528
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 4;

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Meaning
हे (अग्ने) अग्रनायक परमात्मन् वा राजन् ! (तव यया ऊत्या सेनया) आपकी जिस रक्षक सेना के द्वारा, हम (गाः) अन्तःप्रकाश की किरणों को अथवा गाय आदि सम्पत्तियों को (आकरामहै) प्राप्त करते हैं, (ताम्) उस रक्षा को वा सेना को (मघत्तये) ऐश्वर्य के प्रदानार्थ (नः) हमारे लिए (हिन्व) प्रेरित करो ॥२॥
Essence
राजा की सेना से रक्षित प्रजाएँ जैसे भौतिक सम्पत्तियाँ प्राप्त करने में समर्थ होती हैं, वैसे ही परमात्मा के रक्षण-सामर्थ्य से रक्षित जन अध्यात्म- सम्पत्तियाँ प्राप्त कर लेते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर परमात्मा और राजा का विषय है।

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