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Samveda Mantra 1524

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡वा꣢ नो अग्न ऊ꣣ति꣡भि꣢र्गाय꣣त्र꣢स्य꣣ प्र꣡भ꣢र्मणि । वि꣡श्वा꣢सु धी꣣षु꣡ व꣢न्द्य ॥१५२४॥

अ꣡व꣢꣯ । नः꣣ । अग्ने । ऊति꣡भिः꣢ । गा꣣यत्र꣡स्य꣢ । प्र꣡भ꣢꣯र्मणि । प्र । भ꣣र्मणि । वि꣡श्वा꣢꣯सु । धी꣣षु꣢ । व꣣न्द्य ॥१५२४॥

Mantra without Swara
अवा नो अग्न ऊतिभिर्गायत्रस्य प्रभर्मणि । विश्वासु धीषु वन्द्य ॥

अव । नः । अग्ने । ऊतिभिः । गायत्रस्य । प्रभर्मणि । प्र । भर्मणि । विश्वासु । धीषु । वन्द्य ॥१५२४॥

Samveda - Mantra Number : 1524
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 4;

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Meaning
हे (वन्द्य) वन्दनीय (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर ! आप (गायत्रस्य) गायत्री आदि छन्दों से युक्त वेदज्ञान के (प्रभर्मणि) प्रकृष्ट रूप से ग्रहण करने में और (विश्वासु धीषु) सब कर्मों में (ऊतिभिः) अपनी रक्षाओं के साथ (नः) हमें (अव) प्राप्त होओ ॥१॥
Essence
ज्ञानप्राप्ति के समय और कर्म करते समय जो जगदीश्वर को नहीं भूलते, वे श्रेष्ठ ज्ञान के अनुकूल श्रेष्ठ कर्म ही सदा करते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में जगदीश्वर से प्रार्थना की गयी है।

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