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Samveda Mantra 1523

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसूयव आत्रेयाः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वी꣣ति꣡हो꣢त्रं त्वा कवे द्यु꣣म꣢न्त꣣ꣳ स꣡मि꣢धीमहि । अ꣡ग्ने꣢ बृ꣣ह꣡न्त꣢मध्व꣣रे꣢ ॥१५२३॥

वीति꣡हो꣢त्रम् । वी꣣ति꣢ । हो꣣त्रम् । त्वा । कवे । द्युम꣡न्त꣢म् । सम् । इ꣣धीमहि । अ꣡ग्ने꣢꣯ । बृ꣣ह꣡न्त꣢म् । अ꣣ध्वरे꣢ ॥१५२३॥

Mantra without Swara
वीतिहोत्रं त्वा कवे द्युमन्तꣳ समिधीमहि । अग्ने बृहन्तमध्वरे ॥

वीतिहोत्रम् । वीति । होत्रम् । त्वा । कवे । द्युमन्तम् । सम् । इधीमहि । अग्ने । बृहन्तम् । अध्वरे ॥१५२३॥

Samveda - Mantra Number : 1523
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (कवे) क्रान्तदर्शी, (अग्ने) सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर वा विद्वान् आचार्य ! (वीतिहोत्रम्) जगत् के उत्पादनरूप यज्ञ को वा विद्यायज्ञ को करनेवाले, (द्युमन्तम्) तेजस्वी, (बृहन्तम्) गुणों में महान् (त्वा) आपको, हम (अध्वरे) उपासना-यज्ञ, जीवन-यज्ञ वा विद्याध्ययन-यज्ञ में (समिधीमहि) प्रदीप्त करते हैं ॥३॥
Essence
जो परमात्मा और आचार्य का सेवन करते हैं, वे विद्वान्, सदाचारी, गुणवान् और कर्मशूर होते हुए अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्त करते हैं ॥३॥ इस खण्ड में अग्निहोत्र, परमात्मा, राजा, योगिराज और आचार्य के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ चौदहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
आगे फिर उन्हीं के विषय में कहा गया है।