Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 1522

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसूयव आत्रेयाः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं꣡ त्वा꣢ घृतस्नवीमहे꣣ चि꣡त्र꣢भानो स्व꣣र्दृ꣡श꣢म् । दे꣣वा꣢꣫ꣳ आ वी꣣त꣡ये꣢ वह ॥१५२२॥

त꣢म् । त्वा꣣ । घृतस्नो । घृत । स्नो । ईमहे । चि꣡त्र꣢꣯भानो । चि꣡त्र꣢꣯ । भा꣣नो । स्वर्दृ꣡श꣢म् । स्वः꣣ । दृ꣡श꣢꣯म् । दे꣣वा꣢न् । आ । वी꣣त꣡ये꣢ । व꣣ह ॥१५२२॥

Mantra without Swara
तं त्वा घृतस्नवीमहे चित्रभानो स्वर्दृशम् । देवाꣳ आ वीतये वह ॥

तम् । त्वा । घृतस्नो । घृत । स्नो । ईमहे । चित्रभानो । चित्र । भानो । स्वर्दृशम् । स्वः । दृशम् । देवान् । आ । वीतये । वह ॥१५२२॥

Samveda - Mantra Number : 1522
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 3;

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे (घृतस्नो) विद्या-रस तथा आनन्द-रस को बहानेवाले, (चित्रभानो) अद्भुत तेजवाले जगदीश्वर वा आचार्य ! (तम्) उन प्रसिद्ध (स्वर्दृशम्) विवेकरूप प्रकाश को दर्शानेवाले (त्वा) आपसे, हम (ईमहे) याचना करते हैं। आप (वीतये) हमारी प्रगति के लिए (देवान्) दिव्य गुणों को (आ वह) प्राप्त कराओ ॥२॥
Essence
परमात्मा की उपासना से और आचार्यकुल में निवास से आनन्दरस, विद्यारस तथा कर्तव्य और अकर्तव्य का प्रकाश और जीवन में प्रगति प्राप्त होती है ॥२॥
Subject
आगे फिर उन्हीं से प्रार्थना की गयी है।

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.