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Samveda Mantra 1520

1875 Mantra
Devata- अग्निः पवमानः Rishi- शतं वैखानसाः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ प꣡व꣢स्व꣣ स्व꣡पा꣢ अ꣣स्मे꣡ वर्चः꣢꣯ सु꣣वी꣡र्य꣢म् । द꣡ध꣢द्र꣣यिं꣢꣫ मयि꣣ पो꣡ष꣢म् ॥१५२०॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । प꣡व꣢꣯स्व । स्व꣡पाः꣢꣯ । सु꣣ । अ꣡पाः꣢ । अ꣣स्मे꣡इति꣢ । व꣡र्चः꣢꣯ । सु꣣वी꣡र्य꣢म् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् । द꣡ध꣢꣯त् । र꣣यि꣢म् । म꣡यि꣢꣯ । पो꣡ष꣢꣯म् ॥१५२०॥

Mantra without Swara
अग्ने पवस्व स्वपा अस्मे वर्चः सुवीर्यम् । दधद्रयिं मयि पोषम् ॥

अग्ने । पवस्व । स्वपाः । सु । अपाः । अस्मेइति । वर्चः । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् । दधत् । रयिम् । मयि । पोषम् ॥१५२०॥

Samveda - Mantra Number : 1520
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 3;

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Meaning
हे (अग्ने) योगविद्या के पण्डित योगिराज ! (स्वपाः) शुभ कर्मोंवाले आप (अस्मे) हमारे लिए (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ वीर्य से युक्त (वर्चः) योगजन्य तेज (पवस्व) प्राप्त कराओ और (मयि) मुझ योग के जिज्ञासु में (पोषम्) पोषक (रयिम्) विवेकख्यातिरूप अध्यात्म-ऐश्वर्य (दधत्) धारण कराओ ॥३॥
Essence
योगप्रशिक्षक योगिराज स्वयं शुभकर्मों का कर्ता होता हुआ शिष्यों को भी शुभ कर्म करने का उपदेश दे और योगाभ्यास के द्वारा उन मुमुक्षु शिष्यों को वर्चस्वी तथा विवेकख्याति से सम्पन्न करके मोक्ष का अधिकारी बना दे ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में यह बताया गया है कि योगप्रशिक्षक क्या करे।

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