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Samveda Mantra 1518

1875 Mantra
Devata- अग्निः पवमानः Rishi- शतं वैखानसाः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣢ग्न꣣ आ꣡यू꣢ꣳषि पवस꣣ आसुवोर्जमिषं च नः । आरे बाधस्व दुच्छुनाम् ॥१५१८॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । आ꣡यू꣢꣯ꣳषि । प꣣वसे । आ꣢ । सु꣣व । ऊ꣡र्ज꣢꣯म् । इ꣡ष꣢꣯म् । च꣣ । नः । आरे꣢ । बाध꣣स्व । दु꣣च्छु꣡ना꣢म् ॥१५१८॥

Mantra without Swara
अग्न आयूꣳषि पवस आसुवोर्जमिषं च नः । आरे बाधस्व दुच्छुनाम् ॥

अग्ने । आयूꣳषि । पवसे । आ । सुव । ऊर्जम् । इषम् । च । नः । आरे । बाधस्व । दुच्छुनाम् ॥१५१८॥

Samveda - Mantra Number : 1518
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 3;

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Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् योगिराज ! आप (नः) हमारे लिए (ऊर्जम्) प्राणबल (इषं च) और इच्छासिद्धि को (आसुव) प्रदान करो। (दुच्छुनाम्) योगमार्ग में विघ्नभूत दुश्चरित्रता को (आरे) दूर (बाधस्व) धकेल दो ॥१॥
Essence
सिद्ध योगियों के निर्देशन में योगाभ्यास करने से जिज्ञासुओं का जीवन निष्कलङ्क हो जाता है और वे प्राणसिद्धियों तथा इच्छासिद्धियों को शीघ्र ही प्राप्त कर लेते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ६२७ क्रमाङ्क पर परमात्मा, विद्वान् और राजा को तथा उत्तरार्चिक में १४६४ क्रमाङ्क पर आचार्य को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ योगिराज को सम्बोधन करते हैं।

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