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Samveda Mantra 1517

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
प्र꣡ दैवो꣢꣯दासो अ꣣ग्नि꣢र्देव इन्द्रो न मज्मना । अनु मातरं पृथिवीं वि वावृते तस्थौ नाकस्य शर्मणि ॥१५१७॥

प्र꣢ । दै꣡वो꣢꣯दासः । दै꣡वः꣢꣯ । दा꣣सः । अग्निः꣢ । दे꣣वः꣢ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । न । म꣣ज्म꣡ना꣢ । अ꣡नु꣢꣯ । मा꣣त꣡र꣢म् । पृ꣣थिवी꣢म् । वि । वा꣣वृते । तस्थौ꣣ । ना꣡क꣢꣯स्य । श꣡र्म꣢꣯णि ॥१५१७॥

Mantra without Swara
प्र दैवोदासो अग्निर्देव इन्द्रो न मज्मना । अनु मातरं पृथिवीं वि वावृते तस्थौ नाकस्य शर्मणि ॥

प्र । दैवोदासः । दैवः । दासः । अग्निः । देवः । इन्द्रः । न । मज्मना । अनु । मातरम् । पृथिवीम् । वि । वावृते । तस्थौ । नाकस्य । शर्मणि ॥१५१७॥

Samveda - Mantra Number : 1517
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 3;

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Meaning
(दैवोदासः) आनन्द का दाता, (देवः) प्रकाशक (अग्निः) अग्रनायक जगदीश्वर वा राजा (इन्द्रः न) सूर्य के समान (मज्मना) बल से (मातरं पृथिवीम्) माता के समान पालन करनेवाली भूमि को (अनु विवावृते) अनुकूलता से पालता है और (नाकस्य) सुख की (शर्मणि) रक्षा में (तस्थौ) उद्यत रहता है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
जैसे जगदीश्वर प्रजाओं को योगक्षेम प्रदान करता है और भूमि का पालन करता है, वैसे ही राजा भी करे ॥३॥
Subject
तृतीय ऋचा की पूर्वार्चिक में ५१ क्रमाङ्क पर परमात्मा की महिमा के विषय में व्याख्या की गयी थी। यहाँ परमात्मा और राजा दोनों का विषय कहते हैं।