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Samveda Mantra 1515

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ꣡द꣢र्शि गातु꣣वि꣡त्त꣢मो꣣ य꣡स्मि꣢न्व्र꣣ता꣡न्या꣢द꣣धुः꣢ । उ꣢पो꣣षु꣢ जा꣣त꣡मार्य꣢꣯स्य꣣ व꣡र्ध꣢नम꣣ग्निं꣡ न꣢क्षन्तु नो꣣ गि꣡रः꣢ ॥१५१५॥

अ꣡द꣢꣯र्शि । गा꣣तुवि꣡त्त꣢मः । गा꣣तु । वि꣡त्त꣢꣯मः । य꣡स्मि꣢꣯न् । व्र꣣ता꣡नि꣢ । आ꣣दधुः꣢ । आ꣣ । दधुः꣢ । उ꣡प꣢꣯ । उ꣣ । सु꣢ । जा꣣त꣢म् । आ꣡र्य꣢꣯स्य । व꣡र्ध꣢꣯नम् । अ꣣ग्नि꣢म् । न꣣क्षन्तु । नः । गि꣡रः꣢꣯ ॥१५१५॥

Mantra without Swara
अदर्शि गातुवित्तमो यस्मिन्व्रतान्यादधुः । उपोषु जातमार्यस्य वर्धनमग्निं नक्षन्तु नो गिरः ॥

अदर्शि । गातुवित्तमः । गातु । वित्तमः । यस्मिन् । व्रतानि । आदधुः । आ । दधुः । उप । उ । सु । जातम् । आर्यस्य । वर्धनम् । अग्निम् । नक्षन्तु । नः । गिरः ॥१५१५॥

Samveda - Mantra Number : 1515
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
(गातुवित्तमः) कर्तव्य-मार्ग का अतिशय बोध करानेवाले जगदीश्वर वा राजा के (अदर्शि) हमने दर्शन किये हैं, (यस्मिन्) जिसके आश्रय में रहते हुए प्रजाजन (व्रतानि) अपने-अपने कर्तव्य कर्म (आदधुः) करते हैं। (उ सुजातम्) भली-भाँति अन्तरात्मा में प्रकट हुए अथवा निर्वाचन-पद्धति से राजा के पद पर अभिषिक्त हुए और (आर्यस्य वर्धनम्) श्रेष्ठ मनुष्य को बढ़ानेवाले (अग्निम्) अग्रनायक जगदीश्वर वा राजा के पास (नः) हमारे (गिरः) प्रार्थना-वचन (उप नक्षन्तु) पहुँचें ॥१॥
Essence
जैसे जगदीश्वर कर्तव्यमार्ग का बोधक, आर्यों को प्रोत्साहन देनेवाला और दुर्जनों को दण्डित करनेवाला है, वैसे ही राजा को भी होना चाहिए ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ४७ क्रमाङ्क पर परमेश्वर की पूजा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ परमात्मा और राजा का विषय वर्णित करते हैं।