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Samveda Mantra 1514

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त꣡ꣳ होता꣢꣯रमध्व꣣र꣢स्य꣣ प्र꣡चे꣢तसं꣣ व꣡ह्निं꣢ दे꣣वा꣡ अ꣢कृण्वत । द꣡धा꣢ति꣣ र꣡त्नं꣢ विध꣣ते꣢ सु꣣वी꣡र्य꣢म꣣ग्नि꣡र्जना꣢꣯य दा꣣शु꣡षे꣢ ॥१५१४॥

त꣢म् । हो꣡ता꣢꣯रम् । अ꣣ध्वर꣡स्य꣢ । प्र꣡चे꣢꣯तसम् । प्र । चे꣣तसम् । व꣡ह्नि꣢꣯म् । दे꣣वाः꣢ । अ꣣कृण्वत । द꣡धा꣢꣯ति । र꣡त्न꣢꣯म् । वि꣣धते꣢ । सु꣣वी꣡र्य꣢म् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् । अ꣣ग्निः꣢ । ज꣡ना꣢꣯य । दा꣣शु꣡षे꣢ ॥१५१४॥

Mantra without Swara
तꣳ होतारमध्वरस्य प्रचेतसं वह्निं देवा अकृण्वत । दधाति रत्नं विधते सुवीर्यमग्निर्जनाय दाशुषे ॥

तम् । होतारम् । अध्वरस्य । प्रचेतसम् । प्र । चेतसम् । वह्निम् । देवाः । अकृण्वत । दधाति । रत्नम् । विधते । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् । अग्निः । जनाय । दाशुषे ॥१५१४॥

Samveda - Mantra Number : 1514
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
(प्रचेतसम्) चेतानेवाले (वह्निम्) अग्नि को (देवाः) विद्वान् अग्निहोत्री लोग (अध्वरस्य) हिंसारहित यज्ञ का (होतारम्) निष्पादक (अकृण्वत) करते हैं। वह (अग्निः) यज्ञाग्नि (विधते) परमेश्वर-पूजक, (दाशुषे जनाय) हवि देनेवाले अग्निहोत्री को (सुवीर्यम्) सुवीर्य से युक्त (रत्नम्) आरोग्य आदि रत्न (दधाति) प्रदान करता है ॥२॥
Essence
यज्ञाग्नि में रोग हरनेवाले सुगन्धित द्रव्यों की जो आहुति दी जाती है, वह अग्नि-ज्वालाओं द्वारा विच्छिन्न और सूक्ष्म की जाकर वायु के माध्यम से इधर-उधर फैलकर श्वास द्वारा प्राणियों के फेफड़ों में पहुँच कर वहाँ रक्तवाहिनी पतली-पतली केशिकाओं में खून से सम्बद्ध होकर खून में औषध को प्रविष्ट करा देती है और खून की मलिनता को हरकर साँस से बाहर निकाल देती है। इस प्रकार प्राणियों को स्वास्थ्य देती है। अग्निज्वालाओं की दीप्ति, उर्ध्वगति, दोष-दाहकता इत्यादि गुणों को देखकर यज्ञकर्ता अपने अन्दर भी इन गुणों को धारण करने का यत्न करता है। इस प्रकार अग्निहोत्र से बाह्य तथा आन्तरिक दोनों प्रकार के लाभ होते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर अग्निहोत्र का विषय वर्णित है।