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Samveda Mantra 1513

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
दे꣣वो꣡ वो꣢ द्रविणो꣣दाः꣢ पू꣣र्णां꣡ वि꣢वष्ट्वा꣣सि꣡च꣢म् । उ꣡द्वा꣢ सि꣣ञ्च꣢ध्व꣣मु꣡प꣢ वा पृणध्व꣣मा꣡दिद्वो꣢꣯ दे꣣व꣡ ओह꣢ते ॥१५१३॥

दे꣣वः꣢ । वः꣣ । द्रविणोदाः꣢ । द्र꣣विणः । दाः꣢ । पू꣣र्णा꣢म् । वि꣣वष्टु । आसि꣡च꣢म् । आ꣣ । सि꣡च꣢꣯म् । उत् । वा꣣ । सिञ्च꣡ध्व꣢म् । उ꣡प꣢꣯ । वा । पृणध्वम् । आ꣢त् । इत् । वः꣣ । देवः꣢ । ओ꣣हते ॥१५१३॥

Mantra without Swara
देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्वासिचम् । उद्वा सिञ्चध्वमुप वा पृणध्वमादिद्वो देव ओहते ॥

देवः । वः । द्रविणोदाः । द्रविणः । दाः । पूर्णाम् । विवष्टु । आसिचम् । आ । सिचम् । उत् । वा । सिञ्चध्वम् । उप । वा । पृणध्वम् । आत् । इत् । वः । देवः । ओहते ॥१५१३॥

Samveda - Mantra Number : 1513
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 3;

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Meaning
हे मनुष्यो ! (द्रविणोदाः) आरोग्यरूप धन वा बल देनेवाला, (देवः) प्रकाश से परिपूर्ण और प्रकाश देनेवाला यज्ञाग्नि (वः) तुम्हारी (पूर्णाम्) केसर, कस्तूरी आदि से मिश्रित घी से पूर्ण, (आसिचम्) सींचनेवाली सुव्रा को (विवष्टु) ग्रहण करे। तुम (उत्सिञ्चध्वं वा) सुगन्धित द्रव्यों से मिश्रित घृत की आहुतियों से उस अग्नि को सींचो, (उपपृणध्वं वा) और आहुति देने से खाली हुई स्रुवा को फिर घृत से भरो। (आत् इत्) तदनन्तर ही (देवः) प्रदीप्त यज्ञाग्नि (वः) तुम अग्निहोत्रियों को (ओहते) यज्ञ के लाभ प्राप्त करायेगा ॥१॥
Essence
बारम्बार आहुति देने से यज्ञाग्नि आरोग्य, दीप्ति आदि लाभों से याज्ञिकों का उपकार करता हुआ परमेश्वर की उपासना में भी सहायक होता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ५५ क्रमाङ्क पर परमेश्वर की उपासना के विषय में की जा चुकी है। यहाँ अग्निहोत्र का विषय कहते हैं।

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