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Samveda Mantra 1512

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रियमेध आङ्गिरसः Chhand- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
न꣣दं꣢ व꣣ ओ꣡द꣢तीनां न꣣दं꣡ योयु꣢꣯वतीनाम् । प꣡तिं꣢ वो꣣ अ꣡घ्न्या꣢नां धेनू꣣ना꣡मि꣢षुध्यसि ॥१५१२॥

न꣣द꣢म् । वः꣣ । ओ꣡द꣢꣯तीनाम् । न꣣द꣢म् । यो꣡यु꣢꣯वतीनाम् । प꣡ति꣢꣯म् । वः꣣ । अ꣡घ्न्या꣢꣯नाम् । अ । घ्न्या꣣नाम् । घेनूना꣢म् । इ꣣षुध्यसि ॥१५१२॥

Mantra without Swara
नदं व ओदतीनां नदं योयुवतीनाम् । पतिं वो अघ्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि ॥

नदम् । वः । ओदतीनाम् । नदम् । योयुवतीनाम् । पतिम् । वः । अघ्न्यानाम् । अ । घ्न्यानाम् । घेनूनाम् । इषुध्यसि ॥१५१२॥

Samveda - Mantra Number : 1512
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 2;

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Meaning
हे मनुष्यो ! (वः) तुम (ओदतीनाम्) प्रकाश से आप्लुत करनेवाली उषाओं के (नदम्) प्रकाशक जगदीश्वर की, (योयुवतीनाम्) स्वयं को अन्यों के साथ मिलानेवाली नदियों के (नदम्) कल-कल नाद करानेवाले जगदीश्वर की और (वः) तुम्हारी (अघ्न्यानाम्) न मारी जाने योग्य (धेनूनाम्) गायों के (पतिम्) रक्षक इन्द्र जगदीश्वर की स्तुति करो। हे इन्द्र जगदीश्वर ! आप अधार्मिक शत्रुओं पर (इषुध्यसि) बाण चलाते हो, अर्थात् उन्हें दण्डित करते हो ॥१॥ यहाँ ‘नद’ की आवृत्ति में यमक अलङ्कार है और ‘तीनों’ की आवृत्ति में छेकानुप्रास, नकार की आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥१॥
Essence
परमेश्वर की उषाओं को चमकानेवाला, सूर्य को प्रदीप्त करनेवाला, बिजलियों को विद्योतित करनेवाला, पवन को चलानेवाला, नदियों में कल-कल निनाद करानेवाला, धेनुओं में दूध उत्पन्न करनेवाला और दुष्टों का दलन करनेवाला है ॥१॥ इस खण्ड में जगदीश्वर और जीवात्मा का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ चौदहवें अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर परमात्मा की महिमा वर्णित है।

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