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Samveda Mantra 1509

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
ए꣢न्दु꣣मि꣡न्द्रा꣢य सिञ्चत꣣ पि꣡बा꣢ति सो꣣म्यं꣡ मधु꣢꣯ । प्र꣡ राधा꣢꣯ꣳसि चोदयते महित्व꣣ना꣢ ॥१५०९॥

आ꣢ । इ꣡न्दु꣢꣯म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सि꣣ञ्चत । पि꣡बा꣢꣯ति । सो꣣म्य꣢म् । म꣡धु꣢꣯ । प्र । रा꣡धा꣢꣯ꣳसि । चो꣣दयते । महित्वना꣢ ॥१५०९॥

Mantra without Swara
एन्दुमिन्द्राय सिञ्चत पिबाति सोम्यं मधु । प्र राधाꣳसि चोदयते महित्वना ॥

आ । इन्दुम् । इन्द्राय । सिञ्चत । पिबाति । सोम्यम् । मधु । प्र । राधाꣳसि । चोदयते । महित्वना ॥१५०९॥

Samveda - Mantra Number : 1509
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे साथियो ! तुम (इन्द्राय) अपने अन्तरात्मा के लिए (इन्द्रम्) सराबोर करनेवाले ब्रह्मानन्द-रस को (आ सिञ्चत) प्रवाहित करो। वह अन्तरात्मा (सोम्यम्) शान्तिकारी (मधु) उस मधुर ब्रह्मानन्द-रस को (पिबाति) पिये। पिया हुआ वह ब्रह्मानन्द-रस (महित्वना) अपनी महिमा से (राधांसि) ऐश्वर्यों को (प्रचोदयते) प्रेरित करे ॥१॥
Essence
परमात्मा के पास से बहता हुआ आनन्द-रस जीवात्मा से पान किये जाने पर बहुत कल्याणकारी होता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा में पूर्वार्चिक के ३८६ क्रमाङ्क पर इन्द्र शब्द से परमात्मा का ग्रहण किया गया था। यहाँ जीवात्मा का ग्रहण करते हैं।