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Samveda Mantra 1508

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्र्यरुणस्त्रैवृष्णः, त्रसदस्युः पौरुकुत्सः Chhand- ऊर्ध्वा बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ꣡जी꣢जनो अमृत꣣ म꣡र्त्या꣢य꣣ क꣢मृ꣣त꣢स्य꣣ ध꣡र्म꣢न्न꣣मृ꣡त꣢स्य꣣ चा꣡रु꣢णः । स꣡दा꣢सरो꣣ वा꣢ज꣣म꣢च्छा꣣ स꣡नि꣢ष्यदत् ॥१५०८॥

अ꣡जी꣢꣯जनः । अ꣣मृत । अ । मृत । म꣡र्त्या꣢꣯य । कम् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । ध꣡र्म꣢꣯न् । अ꣣मृ꣡त꣢स्य । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯स्य । चा꣡रु꣢꣯णः । स꣡दा꣢꣯ । अ꣣सरः । वा꣡ज꣢꣯म् । अ꣡च्छ꣢꣯ । स꣡नि꣢꣯ष्यदत् ॥१५०८॥

Mantra without Swara
अजीजनो अमृत मर्त्याय कमृतस्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः । सदासरो वाजमच्छा सनिष्यदत् ॥

अजीजनः । अमृत । अ । मृत । मर्त्याय । कम् । ऋतस्य । धर्मन् । अमृतस्य । अ । मृतस्य । चारुणः । सदा । असरः । वाजम् । अच्छ । सनिष्यदत् ॥१५०८॥

Samveda - Mantra Number : 1508
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 2;

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Meaning
हे (अमृत) अमर सोम जगदीश्वर ! आपने (मर्त्याय) मनुष्य ले लिए (ऋतस्य धर्मन्) जल वा सत्यनियम के धारणकर्ता आकाश में (चारुणः) कल्याणकारी, (अमृतस्य) अमृतमय बादल वा सूर्य के (कम्) सुखकारी जल वा प्रकाश को (अजीजनः) उत्पन्न किया है। साथ ही (वाजम् अच्छ) बल प्राप्त कराने के लिए (सनिष्यदत्) प्रवृत्त होते हुए आप (सदा) हमेशा (असरः) धार्मिक उपासकों को प्राप्त होते हो ॥३॥
Essence
जगदीश्वर का हमारे प्रति कितना उपकार है कि वह हमारे लिए आकाश में जल बरसानेवाले बादल को और तेज के खजाने सूर्य को स्थापित करता है और वही सब विपदाओं तथा विघ्नों से मुकाबला करने के लिए हमें मनोबल भी देता है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर उसी विषय का वर्णन है।

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