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Samveda Mantra 1505

1875 Mantra
Devata- विश्वे देवाः Rishi- अग्निस्तापसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
त्वं꣡ नो꣢ अग्ने अ꣣ग्नि꣢भि꣣र्ब्र꣡ह्म꣢ य꣣ज्ञं꣡ च꣢ वर्धय । त्वं꣡ नो꣢ दे꣣व꣡ता꣢तये रा꣣यो꣡ दाना꣢꣯य चोदय ॥१५०५॥

त्व꣢म् । नः꣣ । अग्ने । अग्नि꣡भिः꣢ । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । य꣣ज्ञ꣢म् । च꣣ । वर्धय । त्व꣢म् । नः꣣ । देव꣡ता꣢तये । रा꣣यः꣢ । दा꣡ना꣢꣯य । चो꣣दय ॥१५०५॥

Mantra without Swara
त्वं नो अग्ने अग्निभिर्ब्रह्म यज्ञं च वर्धय । त्वं नो देवतातये रायो दानाय चोदय ॥

त्वम् । नः । अग्ने । अग्निभिः । ब्रह्म । यज्ञम् । च । वर्धय । त्वम् । नः । देवतातये । रायः । दानाय । चोदय ॥१५०५॥

Samveda - Mantra Number : 1505
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्रणायक, ज्योतिप्रदायक, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ जगदीश्वर ! (त्वम्) सर्वशक्तिमान् आप (अग्निभिः) अपनी ज्योतियों से (नः) हमारे (ब्रह्म) जीवात्मा को (यज्ञं च) और हमारे द्वारा किये जानेवाले उपासना, मानवसेवा आदि यज्ञ को (वर्धय) बढ़ाओ। आप (देवतातये) राष्ट्रोत्थानरूप यज्ञ की पूर्ति के लिए (नः) हमें (रायः) विद्या, सुवर्ण, धान्य आदि धन के (दानाय) दान के लिए (चोदय) प्रेरित करो ॥३॥
Essence
परमात्मा के तेज से तेजस्वी होकर हम परमात्मा के समान परोपकार-यज्ञ में संलग्न होवें और विद्या, धन, धान्य आदि का दान करते हुए समाज को उन्नत करें ॥३॥
Subject
आगे फिर उसी विषय को कहा गया है।