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Samveda Mantra 1503

1875 Mantra
Devata- विश्वे देवाः Rishi- अग्निस्तापसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ वि꣡श्वे꣢भिर꣣ग्नि꣢भि꣣र्जो꣢षि꣣ ब्र꣡ह्म꣢ सहस्कृत । ये꣡ दे꣢व꣣त्रा꣢꣫ य आ꣣यु꣢षु꣣ ते꣡भि꣢र्नो महया꣣ गि꣡रः꣢ ॥१५०३

अ꣡ग्ने꣢꣯ । वि꣡श्वे꣢꣯भिः । अ꣣ग्नि꣡भिः꣢ । जो꣡षि꣢꣯ । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । स꣣हस्कृत । सहः । कृत । ये । दे꣣वत्रा꣢ । ये । आ꣣यु꣡षु꣢ । ते꣡भिः꣢꣯ । नः꣣ । महय । गि꣡रः꣢꣯ ॥१५०३॥

Mantra without Swara
अग्ने विश्वेभिरग्निभिर्जोषि ब्रह्म सहस्कृत । ये देवत्रा य आयुषु तेभिर्नो महया गिरः ॥१५०३

अग्ने । विश्वेभिः । अग्निभिः । जोषि । ब्रह्म । सहस्कृत । सहः । कृत । ये । देवत्रा । ये । आयुषु । तेभिः । नः । महय । गिरः ॥१५०३॥

Samveda - Mantra Number : 1503
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
(हे सहस्कृत) ध्यान-बल से प्रकट किये गये (अग्ने) विश्ववन्द्य परमात्मन् ! आप (विश्वेभिः) सब (अग्निभिः) तेजों के साथ (ब्रह्म) हमारे अन्तरात्मा को (जोषि) प्राप्त होओ। (ये) जो तेज (देवत्रा) प्रकाशक बिजली, सूर्य आदियों में हैं और (ये) जो तेज (आयुषु) मनुष्यों में हैं, (तेभिः) उनसे (नः) हमारी (गिरः) वाणियों को (महया) महिमामय करो ॥१॥
Essence
परमात्मा ने जो अग्नियाँ रची हैं, उनसे तेज के तत्त्व को लेकर हम अपने वाणी, मन, बुद्धि, आत्मा आदि को तेजस्वी बनायें ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में अग्नि नाम से जगदीश्वर से प्रार्थना की गयी है।