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Samveda Mantra 1500

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ह꣢꣫मिद्धि पि꣣तु꣡ष्परि꣢꣯ मे꣣धा꣢मृ꣣त꣡स्य꣢ ज꣣ग्र꣡ह꣢ । अ꣣ह꣡ꣳ सूर्य꣢꣯ इवाजनि ॥१५००॥

अ꣣ह꣢म् । इत् । हि । पि꣣तुः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । मे꣣धा꣢म् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । ज꣣ग्र꣡ह꣢ । अ꣣ह꣢म् । सू꣡र्यः꣢꣯ । इ꣣व । अजनि ॥१५००॥

Mantra without Swara
अहमिद्धि पितुष्परि मेधामृतस्य जग्रह । अहꣳ सूर्य इवाजनि ॥

अहम् । इत् । हि । पितुः । परि । मेधाम् । ऋतस्य । जग्रह । अहम् । सूर्यः । इव । अजनि ॥१५००॥

Samveda - Mantra Number : 1500
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
(अहम्) मैंने (इत् हि) निश्चय ही (पितुः परि) पालनकर्ता पिता, आचार्य वा परमेश्वर से (ऋतस्य) सत्य ज्ञान और सत्य आचरण की (मेधाम्) बुद्धि को (जग्रह) ग्रहण कर लिया है। (अहम्) सत्यज्ञान वा सत्य आचरण को प्राप्त मैं (सूर्यः इव) सूर्य के समान सर्वोन्नत, प्रकाशवान् और प्रकाशक (अजनि) हो गया हूँ ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जो माता, पिता वा आचार्य के पास से तथा परमेश्वर की प्रेरणा से सब विद्याओं और सदाचार को सीखकर उनका यथायोग्य सत्कार तथा पूजन करते हैं और दूसरों को विद्याएँ तथा सदाचार सिखाते हैं, वे प्रशंसित होते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में १५२ क्रमाङ्क पर व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ मनुष्य अपनी उपलब्धि का वर्णन कर रहा है।