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Samveda Mantra 150

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ नो꣣ ह꣡रि꣢भिः सु꣣तं꣢ या꣣हि꣡ म꣢दानां पते । उ꣡प꣢ नो꣣ ह꣡रि꣢भिः सु꣣त꣢म् ॥१५०॥

उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । ह꣡रि꣢꣯भिः । सु꣣त꣢म् । या꣣हि꣢ । म꣣दानाम् । पते । उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । ह꣡रि꣢꣯भिः । सु꣣त꣢म् ॥१५०॥

Mantra without Swara
उप नो हरिभिः सुतं याहि मदानां पते । उप नो हरिभिः सुतम् ॥

उप । नः । हरिभिः । सुतम् । याहि । मदानाम् । पते । उप । नः । हरिभिः । सुतम् ॥१५०॥

Samveda - Mantra Number : 150
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

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Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (मदानां पते) आनन्दों के अधिपति परमात्मन् ! आप (नः) हमारे (हरिभिः) ज्ञान को आहरण करनेवाली ज्ञानेन्द्रियों से (सुतम्) उत्पन्न किये ज्ञान को (उप याहि) प्राप्त हों। (नः) हमारे (हरिभिः) कर्म को आहरण करनेवाली कर्मेन्द्रियों से (सुतम्) उत्पादित कर्म को (उप याहि) प्राप्त हों ॥ द्वितीय—आचार्य के पक्ष में। हे (मदानां पते) हर्षप्रदायक ज्ञानों के अधिपति, विविध विद्याओं में विशारद आचार्यप्रवर ! आप (हरिभिः) ज्ञान का आहरण करानेवाले अन्य गुरुजनों के साथ (नः) हमारे (सुतम्) गुरुकुल में प्रविष्ट पुत्र के (उप याहि) पास पहुँचिए। (हरिभिः) दोषों को हरनेवाले अन्य गुरुओं के साथ (नः) हमारे (सुतम्) गुरुकुल में प्रविष्ट पुत्र के (उप याहि) पास पहुँचिए ॥५॥ इस मन्त्र श्लेषालङ्कार है, ‘उप नः हरिभिः सुतम्’ की आवृत्ति में पादावृत्ति यमक है ॥६॥
Essence
उपासक लोग परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि हमारे प्रत्येक ज्ञान और प्रत्येक कर्म में यदि आप व्याप्त हो जाते हैं, तभी हमारा जीवन-यज्ञ सफ़ल होगा। और अपने पुत्र को गुरुकुल में प्रविष्ट कर माता-पिता कुलपति से प्रार्थना करते हैं कि आप विद्याओं को पढ़ाने और चरित्र-निर्माण के लिए अन्य गुरुजनों सहित कृपा करके प्रतिदिन हमारे पुत्र के साथ सान्निध्य करते रहना ॥६॥
Subject
अगले मन्त्र में उपासक परमात्मा को और बालक के माता-पिता आचार्य को कहते हैं।

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