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Samveda Mantra 1497

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣣म꣢मू꣣ षु꣢꣫ त्वम꣣स्मा꣡क꣢ꣳ स꣣निं꣡ गा꣢य꣣त्रं꣡ नव्या꣢꣯ꣳसम् । अ꣡ग्ने꣢ दे꣣वे꣢षु꣣ प्र꣡ वो꣢चः ॥१४९७॥

इ꣣म꣢म् । ऊ꣣ । सु꣢ । त्वम् । अ꣣स्मा꣡क꣢म् । स꣣नि꣢म् । गा꣣यत्र꣢म् । न꣡व्यां꣢꣯सम् । अ꣡ग्ने꣢꣯ । दे꣣वे꣡षु꣢ । प्र । वो꣣चः ॥१४९७॥

Mantra without Swara
इममू षु त्वमस्माकꣳ सनिं गायत्रं नव्याꣳसम् । अग्ने देवेषु प्र वोचः ॥

इमम् । ऊ । सु । त्वम् । अस्माकम् । सनिम् । गायत्रम् । नव्यांसम् । अग्ने । देवेषु । प्र । वोचः ॥१४९७॥

Samveda - Mantra Number : 1497
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 1;

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Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् जगदीश्वर वा आचार्य ! (त्वम् उ) आप (इमम्) इस (अस्माकं सनिम्) हमें बहुत बोध देनेवाले (गायत्रम्) गायत्री आदि छन्दों से युक्त वेदज्ञान को वा गायत्र नामक साम को (देवेषु) दिव्य गुणोंवाले सत्पात्रों में (सु प्रवोचः) भली-भाँति उपदेश करते हो ॥१॥
Essence
जैसे सृष्टि के आदि में जगदीश्वर अग्नि, वायु, आदित्य, अङ्गिरा नामक ऋषियों के हृदय में चारों वेदों को प्रेरित करता है, वैसे ही गुरु लोग आजकल के सत्पात्र शिष्यों को वेदज्ञान का उपदेश करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २८ क्रमाङ्क पर परमेश्वर को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ जगदीश्वर और आचार्य को सम्बोधन है।

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