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Samveda Mantra 1496

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्र्यरुणस्त्रैवृष्णः, त्रसदस्युः पौरुकुत्सः Chhand- ऊर्ध्वा बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ꣢ध꣣ य꣢दि꣣मे꣡ प꣢वमान꣣ रो꣡द꣢सी इ꣣मा꣢ च꣣ वि꣢श्वा꣣ भु꣡व꣢ना꣣भि꣢ म꣣ज्म꣡ना꣢ । यू꣣थे꣢꣫ न नि꣣ष्ठा꣡ वृ꣢ष꣣भो꣡ वि रा꣢꣯जसि ॥१४९६॥

अ꣡ध꣢꣯ । यत् । इ꣣मे꣢इति꣢ । प꣣वमान । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । इ꣣मा꣢ । च꣣ । वि꣡श्वा꣢꣯ । भु꣡व꣢꣯ना । अ꣣भि꣢ । म꣣ज्म꣡ना꣢ । यू꣣थे꣢ । न । नि꣣ष्ठाः꣢ । निः꣣ । स्थाः꣢ । वृ꣣षभः꣢ । वि । रा꣣जसि ॥१४९६॥

Mantra without Swara
अध यदिमे पवमान रोदसी इमा च विश्वा भुवनाभि मज्मना । यूथे न निष्ठा वृषभो वि राजसि ॥

अध । यत् । इमेइति । पवमान । रोदसीइति । इमा । च । विश्वा । भुवना । अभि । मज्मना । यूथे । न । निष्ठाः । निः । स्थाः । वृषभः । वि । राजसि ॥१४९६॥

Samveda - Mantra Number : 1496
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
(अध) और, हे (पवमान) क्रियाशील परमात्मन् ! आप (यत्) जब (इमे रोदसी) इन द्युलोक और भूलोक को (इमा च) तथा इन (विश्वा भुवना) सब भुवनों को (मज्मना) बल से (अभि) अभिभूत करते हो, तब (यूथे न) जैसे गौओं के झुण्ड में (निष्ठाः) स्थित (वृषभा) साँड शोभा पाता है, वैसे ही आप (विराजसि) शोभते हो ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
जैसे गौओं के झुण्ड में वृषभ अपने महत्व के कारण पृथक् शोभा पाता है, वैसे ही ब्रह्माण्ड के लोक-लोकान्तरों के मध्य जगत्स्रष्टा परमेश्वर सर्वाधिक महिमा के कारण पृथक् भासित होता है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर की महिमा वर्णित है।