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Samveda Mantra 1492

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधपुरुमेधावाङ्गिरसौ Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ꣢ नो꣣ वि꣡श्वा꣢सु꣣ ह꣢व्य꣣मि꣡न्द्र꣢ꣳ स꣣म꣡त्सु꣢ भूषत । उ꣢प꣣ ब्र꣡ह्मा꣢णि꣣ स꣡व꣢नानि वृत्रहन्परम꣣ज्या꣡ ऋ꣢चीषम ॥१४९२॥

आ꣢ । नः꣣ । वि꣡श्वा꣢꣯सु । ह꣡व्य꣢꣯म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । स꣣म꣡त्सु꣢ । स꣣ । म꣡त्सु꣢꣯ । भू꣣षत । उ꣡प꣢꣯ । ब्र꣡ह्मा꣢꣯णि । स꣡व꣢꣯नानि । वृ꣣त्रहन् । वृत्र । हन् । परमज्याः꣢ । प꣣रम । ज्याः꣢ । ऋ꣣चीषम ॥१४९२॥

Mantra without Swara
आ नो विश्वासु हव्यमिन्द्रꣳ समत्सु भूषत । उप ब्रह्माणि सवनानि वृत्रहन्परमज्या ऋचीषम ॥

आ । नः । विश्वासु । हव्यम् । इन्द्रम् । समत्सु । स । मत्सु । भूषत । उप । ब्रह्माणि । सवनानि । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । परमज्याः । परम । ज्याः । ऋचीषम ॥१४९२॥

Samveda - Mantra Number : 1492
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 1;

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Meaning
हे राष्ट्रवासी जनो ! तुम (विश्वासु समत्सु) सब देवासुरसंग्रामों में (नः) हम प्रजाजनों के (हव्यम्) आह्वान करने योग्य (इन्द्रम्) परमात्मा वा राजा को (आभूषत) स्वागत-गानों से अलङ्कृत करो। हे (वृत्रहन्) विघ्न-विदारक, पाप-दल के विध्वंसक, (ऋचीषम) स्तोताओं को मान देनेवाले परमात्मन् वा राजन् ! (परमज्याः) प्रबल आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं को विनष्ट करनेवाले आप, हमारे (ब्रह्माणि) ब्रह्मयज्ञों में, तथा (सवनानि) सोमयाग के प्रातः-सवन, माध्यन्दिन-सवन और सायं-सवनों में (उप) आओ ॥१॥
Essence
जैसे जगदीश्वर नास्तिक पापियों को दण्ड देकर और धर्मात्मा आस्तिक लोगों से मित्रता करके धार्मिकता का पोषण करता है, वैसे ही राजा भी करे ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २६९ क्रमाङ्क पर परमेश्वर के विषय में की गयी थी। यहाँ विघ्न दूर करने के लिए परमात्मा और राजा से प्रार्थना करते हैं।

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