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Samveda Mantra 1490

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रियमेध आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ ह꣢꣯रयः ससृज्रि꣣रे꣡ऽरु꣢षी꣣र꣡धि꣢ ब꣣र्हि꣡षि꣢ । य꣢त्रा꣣भि꣢ सं꣣न꣡वा꣢महे ॥१४९०॥

आ꣢ । ह꣡र꣢꣯यः । स꣣सृज्रिरे । अ꣡रु꣢꣯षीः । अ꣡धि꣢꣯ । ब꣣र्हि꣡षि꣢ । य꣡त्र꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । सं꣣न꣡वा꣢महे । स꣣म् । न꣡वा꣢꣯महे ॥१४९०॥

Mantra without Swara
आ हरयः ससृज्रिरेऽरुषीरधि बर्हिषि । यत्राभि संनवामहे ॥

आ । हरयः । ससृज्रिरे । अरुषीः । अधि । बर्हिषि । यत्र । अभि । संनवामहे । सम् । नवामहे ॥१४९०॥

Samveda - Mantra Number : 1490
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
(बर्हिषि अधि) यज्ञरूप इस देह में (अरुषीः) यज्ञ को न हिंसित करनेवाले (हरयः) मन और प्राणसहित ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय रूप घोड़े (आ ससृज्रिरे) आकर जुड़े हुए हैं,(यत्र) जिस देह-यज्ञ में स्थित इन्द्र जीवात्मा को, हम (अभि संनवामहे) संस्तुत करते हैं, उद्बोधन देते हैं ॥२॥
Essence
जो लोग शरीर को यज्ञस्थल, उसमें स्थित इन्द्रियों को ऋत्विज् और जीवात्मा को यजमान मानकर पवित्र जीवन बिताते हैं, वे सफल होते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में जीवात्मा के अधिष्ठान देह का वर्णन है।