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Samveda Mantra 1488

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhand- अतिशक्वरी Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ꣢ध꣣ त्वि꣡षी꣢माꣳ अ꣣भ्यो꣡ज꣢सा꣣ कृ꣡विं꣢ यु꣣धा꣡भ꣢व꣣दा꣡ रोद꣢꣯सी अपृणदस्य म꣣ज्म꣢ना꣣ प्र꣡ वा꣢वृधे । अ꣡ध꣢त्ता꣣न्यं꣢ ज꣣ठ꣢रे꣣ प्रे꣡म꣢रिच्यत꣣ प्र꣡ चे꣢तय꣣ सै꣡न꣢ꣳ सश्चद्दे꣣वो꣢ दे꣣व꣢ꣳ स꣣त्य꣡ इन्दुः꣢꣯ स꣣त्य꣡मिन्द्र꣢꣯म् ॥१४८८॥

अ꣡ध꣢꣯ । त्वि꣡षी꣢꣯मान् । अ꣣भि꣢ । ओ꣡ज꣢꣯सा । कृ꣡वि꣢꣯म् । यु꣣धा꣢ । अ꣣भवत् । आ꣢ । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । अ꣣पृणत् । अस्य । मज्म꣡ना꣢ । प्र꣢ । वा꣣वृधे । अ꣡ध꣢꣯त्त । अ꣣न्य꣢म् । अ꣣न् । य꣢म् । ज꣣ठ꣡रे꣢ । प्र । ई꣣म् । अरिच्यत । प्र꣢ । चे꣣तय । सः꣢ । ए꣣नम् । सश्चत् । दे꣣वः꣢ । दे꣣व꣢म् । स꣣त्यः꣢ । इ꣡न्दुः꣢꣯ । स꣣त्य꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् ॥१४८८॥

Mantra without Swara
अध त्विषीमाꣳ अभ्योजसा कृविं युधाभवदा रोदसी अपृणदस्य मज्मना प्र वावृधे । अधत्तान्यं जठरे प्रेमरिच्यत प्र चेतय सैनꣳ सश्चद्देवो देवꣳ सत्य इन्दुः सत्यमिन्द्रम् ॥

अध । त्विषीमान् । अभि । ओजसा । कृविम् । युधा । अभवत् । आ । रोदसीइति । अपृणत् । अस्य । मज्मना । प्र । वावृधे । अधत्त । अन्यम् । अन् । यम् । जठरे । प्र । ईम् । अरिच्यत । प्र । चेतय । सः । एनम् । सश्चत् । देवः । देवम् । सत्यः । इन्दुः । सत्यम् । इन्द्रम् ॥१४८८॥

Samveda - Mantra Number : 1488
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 6;

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1 Bhashyas
Meaning
(अध) और (त्विषीमान्) प्रशस्त तेजवाला वह इन्द्र जगदीश्वर (ओजसा) बल से (युधा) युद्ध द्वारा (क्रिविम्) हिंसक जन को (अभि अभवत्) परास्त कर देता है। वही (रोदसी) द्युलोक और भूलोक को (आ पृणत्) जल, तेज आदि ऐश्वर्यों से भरपूर करता है। (अस्य) इस इन्द्र जगदीश्वर के (मज्मना) बल से, यह सब जगत् (प्र वावृधे) प्रवृद्ध होता है। वह जगदीश्वर (अन्यम्) किसी को अर्थात् दुष्टाचारी को (जठरे) भूकम्प आदि से भूमि को फाड़कर उसके पेट में (अधत्त) डाल देता है और (ईम्) कोई अर्थात् सदाचारी मनुष्य (प्र अरिच्यत) इसकी महिमा से बढ़ता है। (सः) वह (देवः) दिव्यगुणी, (सत्यः) सत्य का प्रेमी (इन्दुः) तेजस्वी उपासक (देवम्) प्रकाश देनेवाले, (सत्यम्) सत्य गुण, कर्म स्वभाववाले (एनम् इन्द्रम्) इस परमैश्वर्यवान् जगदीश्वर को (सश्चत्) प्राप्त करे। हे जगदीश्वर ! आप उस उपासक को (प्रचेतय) प्रज्ञानयुक्त करो ॥३॥
Essence
जो सज्जनों को पीड़ित करते हैं, उन्हें जो जगत् का स्रष्टा, अपरिमित बलवाला, न जीता जा सकनेवाला जगदीश्वर यथायोग्य दण्डित करता है, उसकी सब लोग श्रद्धा और प्रेम से उपासना करके अपने अभीष्टों को पूर्ण करें ॥३॥ इस खण्ड में उपास्य-उपासक विषय का और परमात्मा की महिमा का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ तेरहवें अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥ तेरहवाँ अध्याय समाप्त॥ षष्ठ प्रपाठक में तृतीय अर्ध समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा की महिमा और उपासक का विषय वर्णित है।