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Samveda Mantra 1482

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- हर्यतः प्रागाथः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣢प꣣ स्र꣡क्वे꣢षु꣣ ब꣡प्स꣢तः कृण्व꣣ते꣢ ध꣣रु꣡णं꣢ दि꣣वि꣢ । इ꣡न्द्रे꣢ अ꣣ग्ना꣢꣫ नमः꣣꣬ स्वः꣢꣯ ॥१४८२॥

उ꣡प꣢꣯ । स्र꣡क्वे꣢꣯षु । ब꣡प्स꣢꣯तः । कृ꣣ण्व꣢ते । ध꣣रु꣡ण꣢म् । दि꣣वि꣢ । इ꣡न्द्रे꣢꣯ । अ꣣ग्ना꣢ । न꣡मः꣢꣯ । स्व३रि꣡ति꣢ ॥१४८२॥

Mantra without Swara
उप स्रक्वेषु बप्सतः कृण्वते धरुणं दिवि । इन्द्रे अग्ना नमः स्वः ॥

उप । स्रक्वेषु । बप्सतः । कृण्वते । धरुणम् । दिवि । इन्द्रे । अग्ना । नमः । स्व३रिति ॥१४८२॥

Samveda - Mantra Number : 1482
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 6;

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1 Bhashyas
Meaning
उपासक लोग (स्रक्वेषु) आत्मसमर्पण होने पर (उप बप्सतः) समीप आकर पापों को खा लेनेवाले परमात्मा का (दिवि) अपने आत्मा में (धरुणम्) धारण (कृण्वते) करते हैं और वे (इन्द्रे) परमैश्वर्यशाली, विघ्नविदारक (अग्ना) अग्रनायक परमात्मा में (नमः) नमस्कार समर्पित करके (स्वः) प्रकाश को पा लेते हैं ॥३॥
Essence
ध्यान द्वारा परमात्मा को अपने आत्मा में धारण करके, श्रद्धा से नमस्कार करके उपासकों को परम ज्योति प्राप्त करनी योग्य है ॥३॥
Subject
आगे फिर वही विषय है।