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Samveda Mantra 1468

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यु꣣ञ्ज꣡न्ति꣢ ब्र꣣ध्न꣡म꣢रु꣣षं꣡ चर꣢꣯न्तं꣣ प꣡रि꣢ त꣣स्थु꣡षः꣢ । रो꣡च꣢न्ते रोच꣣ना꣢ दि꣣वि꣢ ॥१४६८॥

यु꣣ञ्ज꣡न्ति꣢ । ब्र꣣ध्न꣢म् । अ꣣रुष꣢म् । च꣡र꣢न्तम् । प꣡रि꣢꣯ । त꣣स्थु꣢षः꣢ । रो꣡च꣢꣯न्ते । रो꣣चना꣢ । दि꣣वि꣢ ॥१४६८॥

Mantra without Swara
युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः । रोचन्ते रोचना दिवि ॥

युञ्जन्ति । ब्रध्नम् । अरुषम् । चरन्तम् । परि । तस्थुषः । रोचन्ते । रोचना । दिवि ॥१४६८॥

Samveda - Mantra Number : 1468
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 4;

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Meaning
प्रथम—प्राण-अपान के विषय में। विद्वान् योगी लोग (अस्य) इस इन्द्र नामक जीवात्मा के (रथे) शरीररूप रथ में (काम्या) चाहने योग्य, (विपक्षसा) प्राणक्रिया और अपानक्रिया रूप विशिष्ट पंखोंवाले, (शोणा) गतिशील, (धृष्णू) चतुर, (नृवाहसा) मनुष्य-देह को वहन करनेवाले (हरी) प्राण-अपान रूप दो घोड़ों को (युञ्जन्ति) प्राणायाम की विधि से उपयोग में लाते हैं ॥ द्वितीय—शिल्प के विषय में। शिल्पी लोग (अस्य) इस सूर्य या बिजली रूप अग्नि के (काम्या) कमनीय, (विपक्षसा) परस्पर विरुद्ध गुणवाले, (शोणा) गतिशील, (धृष्णू) घर्षणशील, (नृवाहसा) मनुष्यों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जानेवाले (हरी) ऋणात्मक विद्युत् तथा धनात्मक विद्युत् रूप दो घोड़ों को (युञ्जन्ति) भूयान, जलयान तथा विमानों में जोड़ते हैं ॥२॥
Essence
जैसे प्राणायाम का अभ्यास करनेवाले विद्वान् लोग प्राण-अपान रूप घोड़ों को नियुक्त करके शरीर-रथ को चलाते हैं,वैसे ही शिल्पी लोग ऋण और धन विद्युत् को यान आदि तथा घर आदि में लगाकर यात्रा और प्रकाश किया करें ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में दो हरियों का रथ में जोड़ना वर्णित है।

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