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Samveda Mantra 1465

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- यजत आत्रेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ता꣡ नः꣢ शक्तं꣣ पा꣡र्थि꣢वस्य म꣣हो꣢ रा꣣यो꣢ दि꣣व्य꣡स्य꣢ । म꣡हि꣢ वां क्ष꣣त्रं꣢ दे꣣वे꣡षु꣢ ॥१४६५॥

ता꣢ । नः꣣ । शक्तम् । पा꣡र्थि꣢꣯वस्य । म꣣हः꣢ । रा꣣यः꣢ । दि꣣व्य꣡स्य꣢ । म꣡हि꣢꣯ । वा꣣म् । क्षत्र꣢म् । दे꣣वे꣡षु꣢ ॥१४६५॥

Mantra without Swara
ता नः शक्तं पार्थिवस्य महो रायो दिव्यस्य । महि वां क्षत्रं देवेषु ॥

ता । नः । शक्तम् । पार्थिवस्य । महः । रायः । दिव्यस्य । महि । वाम् । क्षत्रम् । देवेषु ॥१४६५॥

Samveda - Mantra Number : 1465
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 4;

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Meaning
हे मित्र-वरुणो अर्थात् ब्राह्मण-क्षत्रियो ! (ता) वे तुम दोनों (नः) हमें (पार्थिवस्य) भौतिक और (दिव्यस्य) आध्यात्मिक (महः) महान् (रायः) ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए (शक्तम्) समर्थ बनाओ। (देवेषु) विद्वानों में (वाम्) तुम दोनों का (महि) महान् (क्षत्रम्) शत्रुजन्य प्रहार से वा अविद्या दुर्व्यसन आदि दोष से त्राण करने का सामर्थ्य है ॥१॥
Essence
जहाँ ब्राह्मण और क्षत्रिय मिलकर श्रेष्ठ विद्या, श्रेष्ठ धर्म आदि के प्रदान द्वारा और शत्रुओं से रक्षा द्वारा उपकारक होते हैं, वह राष्ट्र अत्यधिक उन्नत हो जाता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा उत्तरार्चिक में ११४५ क्रमाङ्क पर परमात्मा और जीवात्मा के विषय में व्याख्यात की जा चुकी है। यहाँ ब्राह्मण और क्षत्रिय से प्रार्थना करते हैं।

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