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Samveda Mantra 1463

1875 Mantra
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सो꣣मा꣢ना꣣ꣳ स्व꣡र꣢णं कृणु꣣हि꣡ ब्र꣢ह्मणस्पते । क꣣क्षी꣡व꣢न्तं꣣ य꣡ औ꣢शि꣣जः꣢ ॥१४६३॥

सो꣣मा꣡ना꣢म् । स्व꣡र꣢꣯णम् । कृ꣣णुहि꣢ । ब्र꣣ह्मणः । पते । कक्षी꣡व꣢न्तम् । यः । औ꣣शिजः꣢ ॥१४६३॥

Mantra without Swara
सोमानाꣳ स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तं य औशिजः ॥

सोमानाम् । स्वरणम् । कृणुहि । ब्रह्मणः । पते । कक्षीवन्तम् । यः । औशिजः ॥१४६३॥

Samveda - Mantra Number : 1463
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 4;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (ब्रह्मणः पते) वेदों के प्रकाण्ड पण्डित आचार्य ! (यः) जो मैं (औशिजः) बहुत अधिक वेदाध्ययन का इच्छुक हूँ, उस मुझको, आप (सोमानाम्) ज्ञानों का (स्वरणम्) प्राप्तकर्ता और (कक्षीवन्तम्) कटिबद्ध (कृणुहि) कर दो ॥२॥
Essence
गुरुओं का यह कर्तव्य है कि वे शिष्यों को विद्वान् और कर्मयोगी बनायें। पुरुषार्थहीन विद्वत्ता कुछ काम नहीं आती है ॥२॥
Subject
द्वितीय ऋचा पूर्वार्चिक में १३९ क्रमाङ्क पर जगदीश्वर को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ आचार्य को कहते हैं।