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Samveda Mantra 1456

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्र꣣ क्र꣡तुं꣢ न꣣ आ꣡ भ꣢र पि꣣ता꣢ पु꣣त्रे꣢भ्यो꣣ य꣡था꣢ । शि꣡क्षा꣢ णो अ꣣स्मि꣡न्पु꣢रुहूत꣣ या꣡म꣢नि जी꣣वा꣡ ज्योति꣢꣯रशीमहि ॥१४५६॥

इ꣡न्द्र꣢꣯ । क्र꣡तु꣢꣯म् । नः꣣ । आ꣢ । भ꣣र । पिता꣢ । पु꣣त्रे꣡भ्यः꣢ । पु꣣त् । त्रे꣡भ्यः꣢꣯ । य꣡था꣢꣯ । शि꣡क्ष꣢꣯ । नः꣣ । अस्मि꣢न् । पु꣣रुहूत । पुरु । हूत । या꣡म꣢꣯नि । जी꣣वाः꣢ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । अ꣣शीमहि ॥१४५६॥

Mantra without Swara
इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा । शिक्षा णो अस्मिन्पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि ॥

इन्द्र । क्रतुम् । नः । आ । भर । पिता । पुत्रेभ्यः । पुत् । त्रेभ्यः । यथा । शिक्ष । नः । अस्मिन् । पुरुहूत । पुरु । हूत । यामनि । जीवाः । ज्योतिः । अशीमहि ॥१४५६॥

Samveda - Mantra Number : 1456
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) विघ्नविनाशक, विश्ववेत्ता, सर्वकारी, सर्वशक्तिमन् परमात्मन् ! आप (नः) हमें (क्रतुम्) प्रज्ञा और कर्म को (आ भर) प्रदान करो, (यथा) जिस प्रकार (पिता) पिता (पुत्रेभ्यः) सन्तानों को प्रदान करता है। हे (पुरुहूत) बहुतों से पुकारे जानेवाले जगदीश्वर ! आप (अस्मिन् यामनि) इस संसार-मार्ग में (नः) हमें (शिक्ष) कर्तव्य-अकर्तव्य की शिक्षा दो। (जीवाः) जीवन से अनुप्राणित हम, आपके पास से (ज्योतिः) दिव्य ज्योति को (अशीमहि) प्राप्त करें ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जैसे माता, पिता और आचार्य मनुष्य के शिक्षक हैं, वैसे ही परमेश्वर भी है। वह अन्तरात्मा में प्रविष्ट हुआ सदा ही सत्य-असत्य का उपदेश करता रहता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २५९ क्रमाङ्क पर परमात्मा और आचार्य को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।