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Samveda Mantra 1450

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सुकक्ष आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣢꣯द्घेद꣣भि꣢ श्रु꣣ता꣡म꣢घं वृष꣣भं꣡ नर्या꣢꣯पसम् । अ꣡स्ता꣢रमेषि सूर्य ॥१४५०॥

उ꣢त् । घ꣣ । इ꣢त् । अ꣣भि꣢ । श्रु꣣ता꣡म꣢घम् । श्रु꣣त꣢ । म꣣घम् । वृषभ꣢म् । न꣡र्या꣢꣯पसम् । न꣡र्य꣢꣯ । अ꣣पसम् । अ꣡स्ता꣢꣯रम् । ए꣣षि । सूर्य ॥१४५०॥

Mantra without Swara
उद्घेदभि श्रुतामघं वृषभं नर्यापसम् । अस्तारमेषि सूर्य ॥

उत् । घ । इत् । अभि । श्रुतामघम् । श्रुत । मघम् । वृषभम् । नर्यापसम् । नर्य । अपसम् । अस्तारम् । एषि । सूर्य ॥१४५०॥

Samveda - Mantra Number : 1450
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सूर्य) सूर्य के समान प्रतापी वीर ! आप (श्रुतामघम्) प्रसिद्ध धनोंवाले, (वृषभम्) बलवान् (नर्यापसम्) मनुष्यों के हितकारक कर्मों को करनेवाले, (अस्तारम्) दुःख, दुर्गुण, दुर्व्यसन आदि को परे फ़ेंक देनेवाले प्रजाजन को (घ इत्) ही (अभि) लक्ष्य करके (उदेषि) राजा रूप में राष्ट्रगगन में उदित होते हो ॥१॥
Essence
जिसके राज्य में सुयोग्य प्रजाएँ हैं, वही राजा सुयोग्य माना जाता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में १२५ क्रमाङ्क पर परमात्मा को सम्बोधन की गयी थी। परमात्मा का प्रचार भी उन्नत राष्ट्र में ही हो सकता है, इसलिए यहाँ राष्ट्रोन्नति के निमित्त राजा का विषय वर्णित करते हैं।