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Samveda Mantra 145

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡पा꣢दु शि꣣प्र्य꣡न्ध꣢सः सु꣣द꣡क्ष꣢स्य प्रहो꣣षि꣡णः꣢ । इ꣢न्द्रो꣣रि꣢न्द्रो꣣ य꣡वा꣢शिरः ॥१४५॥

अ꣡पा꣢꣯त् । उ꣣ । शिप्री꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । सु꣣द꣡क्ष꣢स्य । सु꣣ । द꣡क्ष꣢꣯स्य । प्र꣣होषि꣡णः꣢ । प्र꣣ । होषि꣡णः꣢ । इ꣢न्दोः꣢꣯ । इन्द्रः꣢꣯ । य꣡वा꣢꣯शिरः । य꣡व꣢꣯ । आ꣣शिरः ॥१४५॥

Mantra without Swara
अपादु शिप्र्यन्धसः सुदक्षस्य प्रहोषिणः । इन्द्रोरिन्द्रो यवाशिरः ॥

अपात् । उ । शिप्री । अन्धसः । सुदक्षस्य । सु । दक्षस्य । प्रहोषिणः । प्र । होषिणः । इन्दोः । इन्द्रः । यवाशिरः । यव । आशिरः ॥१४५॥

Samveda - Mantra Number : 145
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

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Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष मे। (शिप्री) सर्वव्यापक (इन्द्रः) परमात्मा (सुदक्षस्य) अतिकुशल, (प्रहोषिणः) प्रकृष्ट रूप से आत्मसमर्पण रूप हवि का होम करनेवाले, (इन्दोः) चन्द्रमा के समान सौम्य उपासक के (यवाशिरः) यवों के तुल्य सात्त्विक ज्ञान और कर्मों के साथ परिपक्व (अन्धसः) भक्ति-रूप सोमरस का (अपात् उ) निश्चय ही पान करता है, अर्थात् ज्ञान-कर्म-पूर्वक की गयी भक्ति को अवश्य स्वीकार करता है ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (शिप्री) राजमुकुटधारी (इन्द्रः) राजा (सुदक्षस्य) सुसमृद्ध, (प्रहोषिणः) कर-रूप से राजा के लिए देय भाग को कर-विभाग में देनेवाले, (इन्दोः) राष्ट्र को सींचनेवाले प्रजाजन के (यवाशिरः) जौ, गेहूँ, तिल, चावल, मूँग उड़द आदि सहित (अन्धसः) खाद्य, पेय, वस्त्र, सोना, चाँदी, मुद्रा आदि रूप में प्रदत्त राज-कर को (अपात् उ) अवश्य ग्रहण करता है ॥ तृतीय—सूर्य के पक्ष में। (शिप्री) किरणोंवाला (इन्द्रः) सूर्य (सुदक्षस्य) अतिशय समृद्ध, (प्रहोषिणः) अपने जल रूप हवि का होम करनेवाले भूमण्डल के (यवाशिरः) संयोगविभागकारी ताप से पककर भापरूप में परिणत होनेवाले (अन्धसः) भोज्यरूप (इन्दोः) जल का (अपात् उ) अवश्य पान करता है ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
Essence
जैसे राजा प्रजाजनों के कररूप उपहार को और सूर्य भूमण्डल के जलरूप उपहार को स्वीकार करता है, वैसे ही परमात्मा उपासकों के ज्ञानकर्ममय भक्तिरस के उपहार को प्रेमपूर्वक स्वीकार करता है ॥१॥ इस मन्त्र की व्याख्या में सायणाचार्य ने जो ‘सुदक्ष’ शब्द से सुदक्ष नाम के ऋषि का ग्रहण किया है, वह अन्य भाष्यकारों के विरुद्ध होने से ही खण्डित हो जाता है, क्योंकि ‘सुदक्ष’ का अर्थ विवरणकार माधव ने ‘भले प्रकार उत्सादित’ और भरतस्वामी ने ‘अतिशय बलवान्’ किया है। इस प्रकार के प्रसिद्धार्थक शब्दों को भी नाम मान लेने पर तो वेदों के सभी सुबन्त पद किसी ऋषि या राजा के नाम हो जाएँगे ॥
Subject
प्रथम मन्त्र में यह वर्णन है कि इन्द्र समर्पणकर्ता के सोमरस को स्वीकार करता है।