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Samveda Mantra 1440

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्र꣡त्य꣢स्मै꣣ पि꣡पी꣢षते꣣ वि꣡श्वा꣢नि वि꣣दु꣡षे꣢ भर । अ꣣रङ्गमा꣢य꣣ ज꣢ग्म꣣ये꣡ऽप꣢श्चादध्वने꣣ न꣡रः꣢ ॥१४४०॥

प्र꣡ति꣢꣯ । अ꣣स्मै । पि꣡पी꣢꣯षते । वि꣡श्वा꣢꣯नि । वि꣣दु꣡षे꣢ । भ꣣र । अरङ्गमा꣡य꣢ । अ꣣रम् । ग꣡मा꣢य । ज꣡ग्म꣢꣯ये । अ꣡प꣢꣯श्चादध्वने । अ꣡प꣢꣯श्चा । द꣣ध्वने । न꣡रः꣢꣯ ॥१४४०॥

Mantra without Swara
प्रत्यस्मै पिपीषते विश्वानि विदुषे भर । अरङ्गमाय जग्मयेऽपश्चादध्वने नरः ॥

प्रति । अस्मै । पिपीषते । विश्वानि । विदुषे । भर । अरङ्गमाय । अरम् । गमाय । जग्मये । अपश्चादध्वने । अपश्चा । दध्वने । नरः ॥१४४०॥

Samveda - Mantra Number : 1440
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 1;

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Meaning
हे मानव ! (नरः) पुरुषार्थी तू (पिपीषते) तेरे श्रद्धारस को पान करने के इच्छुक, (विश्वानि विदुषे) सब जानने योग्य विषयों को जाननेवाले, (अरङ्गमाय) पर्याप्त देनेवाले, (जग्मये) क्रियाशील, (अपश्चा-दध्वने) पीछे पग न रखनेवाले (अस्मै) इस इन्द्र जगदीश्वर के लिए (प्रतिभर) श्रद्धा का उपहार प्रदान कर ॥१॥
Essence
परमात्मा में श्रद्धा रखता हुआ मनुष्य कभी जीवन में पतन को प्राप्त नहीं करता ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ३५२ क्रमाङ्क पर परमात्मा और आचार्य के विषय में की जा चुकी है। यहाँ जगदीश्वर की उपासना का विषय दर्शाते हैं।

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