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Samveda Mantra 1421

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
पि꣡बा꣢ सु꣣त꣡स्य꣢ र꣣सि꣢नो꣣ म꣡त्स्वा꣢ न इन्द्र꣣ गो꣡म꣢तः । आ꣣पि꣡र्नो꣢ बोधि सध꣣मा꣡द्ये꣢ वृ꣣धे꣢३꣱ऽस्मा꣡ꣳ अ꣢वन्तु ते꣣ धि꣡यः꣢ ॥१४२१॥

पि꣡ब꣢꣯ । सु꣣त꣡स्य꣢ । र꣣सि꣡नः꣢ । म꣡त्स्व꣢꣯ । नः꣣ । इन्द्र । गो꣡म꣢꣯तः । आ꣣पिः꣢ । नः꣣ । बोधि । सधमा꣡द्ये꣢ । स꣣ध । मा꣡द्ये꣢꣯ । वृ꣣धे꣢ । अ꣣स्मा꣢न् । अ꣣वन्तु । ते । धि꣡यः꣢꣯ ॥१४२१॥

Mantra without Swara
पिबा सुतस्य रसिनो मत्स्वा न इन्द्र गोमतः । आपिर्नो बोधि सधमाद्ये वृधे३ऽस्माꣳ अवन्तु ते धियः ॥

पिब । सुतस्य । रसिनः । मत्स्व । नः । इन्द्र । गोमतः । आपिः । नः । बोधि । सधमाद्ये । सध । माद्ये । वृधे । अस्मान् । अवन्तु । ते । धियः ॥१४२१॥

Samveda - Mantra Number : 1421
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 5;

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Meaning
हे (इन्द्र) विघ्नों के विनाशक सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ! आप (रसिनः) रसीले (सुतस्य) प्रकट हुए मेरे प्रेमरस का (पिब) पान करो, (गोमतः) गाय आदि के ऐश्वर्यों से युक्त (नः) हम लोगों को (मत्स्व) आनन्दित करो। (सधमादे) सहयात्रा में (वृधे) बढ़ाने के लिए (आपिः) बन्धु बने हुए आप (नः) हमें (बोधि) बोध दो। (ते) आपके (धियः) प्रज्ञा और कर्म(अस्मान्) हम उपासकों की (अवन्तु) रक्षा करें ॥१॥
Essence
यदि हम परमात्मा से स्नेह करते हैं तो वह भी हमसे स्नेह करता है और सद्बुद्धि, सत्कर्म आदि देकर हमारा उपकार करता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २३९ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ परमेश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं।

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