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Samveda Mantra 142

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रगाथः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
क्वा꣢३꣱स्य꣡ वृ꣢ष꣣भो꣡ युवा꣢꣯ तुवि꣣ग्री꣢वो꣣ अ꣡ना꣢नतः । ब्र꣣ह्मा꣡ कस्तꣳ स꣢꣯पर्यति ॥१४२॥

क्व꣢꣯ । स्यः । वृ꣣षभः꣢ । यु꣡वा꣢꣯ । तु꣣विग्री꣡वः꣢ । तु꣣वि । ग्री꣡वः꣢꣯ । अ꣡ना꣢꣯नतः । अन् । आ꣣नतः । ब्रह्मा꣢ । कः । तम् । स꣣पर्यति ॥१४२॥

Mantra without Swara
क्वा३स्य वृषभो युवा तुविग्रीवो अनानतः । ब्रह्मा कस्तꣳ सपर्यति ॥

क्व । स्यः । वृषभः । युवा । तुविग्रीवः । तुवि । ग्रीवः । अनानतः । अन् । आनतः । ब्रह्मा । कः । तम् । सपर्यति ॥१४२॥

Samveda - Mantra Number : 142
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
(क्व) कहाँ है (स्यः) वह (वृषभः) आनन्द की वर्षा करनेवाला, (युवा) नित्य युवा, अर्थात् युवक के समान सदा शक्तिशाली, (तुविग्रीवः) अतिशय रूप से प्रलयकाल में जगत् को निगलनेवाला अर्थात् प्रकृति में लय करनेवाला और बहुत उपदेश देनेवाला, (अनानतः) शत्रु के संमुख कभी न झुकनेवाला, इन्द्र परमेश्वर? (कः) कौन सा (ब्रह्मा) विद्या-वृद्ध जन (तम्) पूर्वोक्त विशेषताओं से युक्त उस इन्द्र परमेश्वर को (सपर्यति) पूजता है? ॥८॥
Essence
तुम कहते हो कि ब्रह्माण्ड का कोई शासक है, जो बादल के समान सबके ऊपर सुख बरसाता है जो न कभी बालक होता है, न कभी बूढ़ा, किन्तु सदा युवा ही रहता है, जो मानो हजार ग्रीवाओंवाला होकर प्रलयकाल में सब पदार्थों को निगलता है और सृष्टिकाल में सहस्रों जनों को ज्ञान का उपदेश करता है, जो कभी शत्रुओं के सम्मुख झुकता नहीं, अपितु उन्हें ही झुका लेता है। हम पूछते हैं कि वह कहाँ है? यदि है, तो दिखाओ। तुम कहते हो कि वह पूजनीय है। हम पूछते हैं कि भला कौन विद्वान् है जो उस निराकार, अशरीरी, अदृश्य, अश्रव्य की पूजा कर सके? इसलिए वह है ही नहीं, न ही कोई उसकी पूजा कर सकता है, यह प्रश्नकर्ता का अभिप्राय है ॥८॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा के विषय में प्रश्न उठाया गया है।