Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 1410

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ꣣रु꣡ग꣢व्यूति꣣र꣡भ꣢यानि कृ꣣ण्व꣡न्त्स꣢मीची꣣ने꣡ आ प꣢꣯वस्वा꣣ पु꣡र꣢न्धी । अ꣣पः꣡ सिषा꣢꣯सन्नु꣣ष꣢सः꣣ स्व꣢ऽ३र्गाः꣡ सं चि꣢꣯क्रदो म꣣हो꣢ अ꣣स्म꣢भ्यं꣣ वा꣡जा꣢न् ॥१४१०॥

उ꣣रु꣡ग꣢व्यूतिः । उ꣣रु꣢ । ग꣣व्यूतिः । अ꣡भ꣢꣯यानि । अ । भ꣣यानि । कृ꣣ण्व꣢न् । स꣣मीचीने꣢ । स꣣म् । ईचीने꣡इति꣢ । आ । प꣢वस्व । पु꣡र꣢꣯न्धी । पु꣡र꣢꣯म् । धी꣣इ꣡ति꣢ । अ꣣पः꣢ । सि꣡षा꣢꣯सन् । उ꣣ष꣡सः꣢ । स्वः꣢ । गाः । सम् । चि꣣क्रदः । महः꣢ । अ꣣स्म꣡भ्य꣢म् । वा꣡जा꣢꣯न् ॥१४१०॥

Mantra without Swara
उरुगव्यूतिरभयानि कृण्वन्त्समीचीने आ पवस्वा पुरन्धी । अपः सिषासन्नुषसः स्वऽ३र्गाः सं चिक्रदो महो अस्मभ्यं वाजान् ॥

उरुगव्यूतिः । उरु । गव्यूतिः । अभयानि । अ । भयानि । कृण्वन् । समीचीने । सम् । ईचीनेइति । आ । पवस्व । पुरन्धी । पुरम् । धीइति । अपः । सिषासन् । उषसः । स्वः । गाः । सम् । चिक्रदः । महः । अस्मभ्यम् । वाजान् ॥१४१०॥

Samveda - Mantra Number : 1410
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 4;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे सोम अर्थात् सर्वान्तर्यामी परमात्मन् ! (उरुगव्यूतिः) विस्तीर्ण मार्ग या कार्यक्षेत्रवाले, सबको (अभयानि) निर्भय (कृण्वन्) करनेवाले आप (समीचीने) आपस में सङ्गति रखनेवाले (पुरन्धी) द्युलोक तथा भूलोक को और देहपुरी के धारणकर्ता प्राण-अपान को (आ पवस्व) पवित्र करो। (अपः) जलों को, (उषसः) उषाओं को (स्वः) सूर्य को और (गाः) भूमियों को (सिषासन्) देनेवाले आप (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (महः वाजान्) महान् अन्न, धन, बल आदि को (सं चिक्रदः) बुलाते हो, प्रदान करते हो ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे सोम अर्थात् प्रजापालक राजन् ! (उरुगव्यूतिः) राष्ट्र में यातायात के लिए चौड़े मार्ग बनवानेवाले और उन मार्गों पर (अभयानि) निर्भयता (कृण्वन्) करनेवाले आप (समीचीने) भली-भाँति कार्य में तत्पर (पुरन्धी) स्त्री-पुरुषों को (आ पवस्व) सहायता के लिए प्राप्त होओ। आप (अपः) नदी, प्रपात आदि के जलों को, (उषसः) बिजलियों को, (स्वः) सूर्य, को और (गाः) भूमियों को (सिषासन्) उपयोग में लाने की योजनाएँ बनाते हुए (अस्मभ्यम्) हम प्रजाओं के लिए (महः वाजान्) महान्, अन्न, धन आदि (संचिक्रदः) बुलाओ, प्राप्त कराओ ॥३॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥३॥
Essence
परमेश्वर ने हमारे लिए भूमि, जल, वायु बिजली, सूर्य-किरणें आदि पदार्थ बिना मूल्य के दिये हुए हैं। राजा का कर्तव्य है कि उनका शिल्पकार्यों में उपयोग करके राष्ट्रवासियों को सुखी करे ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा और राजा से प्रार्थना की गयी है।