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Samveda Mantra 141

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣द्य꣡ नो꣢ देव सवितः प्र꣣जा꣡व꣢त्सावीः꣣ सौ꣡भ꣢गम् । प꣡रा꣢ दुः꣣ष्व꣡प्न्य꣢ꣳ सुव ॥१४१॥

अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । नः꣣ । देव । सवितरि꣡ति꣢ । प्र꣣जा꣡व꣢त् । प्र꣣ । जा꣡व꣢꣯त् । सा꣣वीः । सौ꣡भ꣢꣯गम् । सौ । भ꣣गम् । प꣡रा꣢꣯ । दु꣣ष्वप्न्य꣢म् । दुः꣣ । स्व꣡प्न्य꣢꣯म् । सु꣣व ॥१४१॥

Mantra without Swara
अद्य नो देव सवितः प्रजावत्सावीः सौभगम् । परा दुःष्वप्न्यꣳ सुव ॥

अद्य । अ । द्य । नः । देव । सवितरिति । प्रजावत् । प्र । जावत् । सावीः । सौभगम् । सौ । भगम् । परा । दुष्वप्न्यम् । दुः । स्वप्न्यम् । सुव ॥१४१॥

Samveda - Mantra Number : 141
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

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Meaning
मन्त्र का देवता इन्द्र होने से मन्त्रोक्त ‘देव’ और ‘सवितः’ उसी के विशेषण हैं। हे (देव) ऐश्वर्यप्रदायक, प्रकाशमय, प्रकाशक, सर्वोपरि विराजमान, (सवितः) उत्तम बुद्धि आदि के प्रेरक इन्द्र परमात्मन् ! (अद्य) आज, आप (नः) हमारे लिए (प्रजावत्) सन्ततियुक्त अर्थात् उत्तरोत्तर बढ़नेवाले (सौभगम्) धर्म, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य आदि का धन (सावीः) प्रेरित कीजिए, (दुःष्वप्न्यम्) दिन का दुःस्वप्न, रात्रि का दुःस्वप्न और उनसे होनेवाले कुपरिणामों को (परासुव) दूर कर दीजिए ॥७॥
Essence
परमात्मा की उपासना से मनुष्य निरन्तर बढ़नेवाले सद्गुणरूप बहुमूल्य धन को और दोषों से मुक्ति को पा लेता है ॥७॥
Subject
अगले मन्त्र में प्रेरक परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।