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Samveda Mantra 1406

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सुतंभर आत्रेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣡र्जु꣢षत नो꣣ गि꣢रो꣣ हो꣢ता꣣ यो꣡ मानु꣢꣯षे꣣ष्वा꣢ । स꣡ य꣢क्ष꣣द्दै꣢व्यं꣣ ज꣡न꣢म् ॥१४०६॥

अ꣣ग्निः꣢ । जु꣣षत । नः । गि꣡रः꣢꣯ । हो꣡ता꣢꣯ । यः । मा꣡नु꣢꣯षेषु । आ । सः । य꣣क्षत् । दै꣡व्य꣢꣯म् । ज꣡न꣢꣯म् ॥१४०६॥

Mantra without Swara
अग्निर्जुषत नो गिरो होता यो मानुषेष्वा । स यक्षद्दैव्यं जनम् ॥

अग्निः । जुषत । नः । गिरः । होता । यः । मानुषेषु । आ । सः । यक्षत् । दैव्यम् । जनम् ॥१४०६॥

Samveda - Mantra Number : 1406
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 4;

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Meaning
(अग्निः) अग्रनायक परमेश्वर (नः) हमारी (गिरः) स्तुति वा प्रार्थना की वाणियों को (जुषत) स्वीकार करे, (यः) जो परमेश्वर (मानुषेषु) मनुष्यों में (होता) उनके जीवन-यज्ञ का होता बनकर (आ) निवास कर रहा है। (सः) वह (दैव्यम्) दिव्यगुणों में निष्णात (जनम्) विद्वान् जन को (यक्षत्) हमें प्रदान करे ॥२॥
Essence
जिस राष्ट्र में दिव्य गुणों से युक्त विद्वान् मनुष्य होते हैं, वह राष्ट्र अत्यन्त उन्नत होता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में यह कथन है कि परमेश्वर हमारे लिए क्या करे।

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