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Samveda Mantra 1397

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ग꣡र्भे꣢ मा꣣तुः꣢ पि꣣तु꣢ष्पि꣣ता꣡ वि꣢दिद्युता꣣नो꣢ अ꣣क्ष꣡रे꣢ । सी꣡द꣢न्नृ꣣त꣢स्य꣣ यो꣢नि꣣मा꣢ ॥१३९७॥

ग꣡र्भे꣢꣯ । मा꣣तुः꣢ । पि꣣तुः꣢ । पि꣣ता꣢ । वि꣣दिद्युतानः꣢ । वि꣣ । दिद्युतानः꣢ । अ꣣क्ष꣡रे꣢ । सी꣡द꣢꣯न् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । यो꣡नि꣢꣯म् । आ ॥१३९७॥

Mantra without Swara
गर्भे मातुः पितुष्पिता विदिद्युतानो अक्षरे । सीदन्नृतस्य योनिमा ॥

गर्भे । मातुः । पितुः । पिता । विदिद्युतानः । वि । दिद्युतानः । अक्षरे । सीदन् । ऋतस्य । योनिम् । आ ॥१३९७॥

Samveda - Mantra Number : 1397
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
जो (मातुः) माता सावित्री के (गर्भे) गर्भ में स्थित हो चुका है, जो (पितुः) मेरे पिता का भी (पिता) द्वितीय जन्म देनेवाला है, जो (अक्षरे) अक्षर परब्रह्म में (विदिद्युतानः) विशेषरूप से प्रकाशमान है और जो (ऋतस्य) सत्य ज्ञान के (योनिम्) कारणभूत वेद के (आसीदन्) निकट स्थित है, वह (अग्निः) विद्या से प्रकाशित आचार्य, मेरे (वृत्राणि) दोषों को (जङ्घनत्) अतिशयरूप से नष्ट करे। [यहाँ अग्निः वृत्राणि, जङ्घनत् पद पूर्वमन्त्र से लाये गए हैं] ॥२॥
Essence
जो स्वयं सावित्री और आचार्य के गर्भ में रहकर द्विज हो चुका है, वही विद्वान् सच्चरित्र आचार्य शिष्यों को विद्वान् बनाने तथा उनके दोषों को दूर करने में समर्थ होता है ॥२॥
Subject
आगे फिर आचार्य का विषय वर्णित करते हैं।