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Samveda Mantra 1391

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथि0मेध्यातिथी काण्वौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ꣡ त्वा꣢ स꣣ह꣢स्र꣣मा꣢ श꣣तं꣢ यु꣣क्ता꣡ रथे꣢꣯ हिर꣣ण्य꣡ये꣢ । ब्र꣣ह्म꣢युजो꣣ ह꣡र꣢य इन्द्र के꣣शि꣢नो꣣ व꣡ह꣢न्तु꣣ सो꣡म꣢पीतये ॥१३९१॥

आ꣢ । त्वा꣣ । सह꣡स्र꣢म् । आ । शत꣣म्꣢ । यु꣣क्ताः꣢ । र꣡थे꣢꣯ । हि꣣रण्य꣡ये꣢ । ब्र꣣ह्मयु꣡जः꣢ । ब्र꣣ह्म । यु꣡जः꣢꣯ । ह꣡र꣢꣯यः । इ꣣न्द्र । केशि꣡नः꣢꣯ । व꣡ह꣢꣯न्तु । सो꣡म꣢꣯पीतये । सो꣡म꣢꣯ । पी꣣तये ॥१३९१॥

Mantra without Swara
आ त्वा सहस्रमा शतं युक्ता रथे हिरण्यये । ब्रह्मयुजो हरय इन्द्र केशिनो वहन्तु सोमपीतये ॥

आ । त्वा । सहस्रम् । आ । शतम् । युक्ताः । रथे । हिरण्यये । ब्रह्मयुजः । ब्रह्म । युजः । हरयः । इन्द्र । केशिनः । वहन्तु । सोमपीतये । सोम । पीतये ॥१३९१॥

Samveda - Mantra Number : 1391
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 2;

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Meaning
हे (इन्द्र) जगदीश्वर ! (हिरण्यये) ज्योतिर्मय (रथे) वेगवान् सूर्यमण्डल में (युक्ताः) नियुक्त, (ब्रह्मयुजः) बड़े-बड़े ग्रह-उपग्रहों से जुड़नेवाली, (केशिनः) प्रकाशमान और प्रकाशक (सहस्रम्) हजार (हरयः) किरणें (सोमपीतये) परमानन्द-रस के पानके लिए (त्वा) तुझ जगदीश्वर को (आवहन्तु) हमारे समीप लाएँ, (शतं सहस्रम्) सौ हजार किरणें तुझे हमारे समीप लाएँ। सूर्य और सूर्य की किरणें दर्शकों के सामने परमात्मा की ही महिमा को प्रकाशित करती हैं, इस अभिप्राय से यह कहा गया है ॥१॥
Essence
अग्नि, वायु, सूर्य, तारे, बादल, नदी, समुद्र आदियों में विद्यमान विभूति को देखकर उनके निर्माता जगदीश्वर में श्रद्धा करके विद्वान् लोग उसकी उपासना से परम आनन्द का अनुभव करते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २४५ क्रमाङ्क पर अध्यात्म और अधिराष्ट्र रूप में की जा चुकी है। यहाँ सूर्य के वर्णन द्वारा परमात्मा की महिमा प्रकाशित करते हैं।

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