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Samveda Mantra 1390

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न꣡ की꣢ रे꣣व꣡न्त꣢ꣳ स꣣ख्या꣡य꣢ विन्दसे꣣ पी꣡य꣢न्ति ते सुरा꣣꣬श्वः꣢꣯ । य꣣दा꣢ कृ꣣णो꣡षि꣢ नद꣣नु꣡ꣳ समू꣢꣯ह꣣स्या꣢꣫दित्पि꣣ते꣡व꣢ हूयसे ॥१३९०॥

न꣢ । किः꣣ । रेव꣡न्त꣢म् । स꣣ख्या꣡य꣢ । स꣣ । ख्या꣡य꣢꣯ । वि꣣न्दसे । पी꣡य꣢꣯न्ति । ते꣣ । सुराश्वः꣢ । य꣣दा꣢ । कृ꣣णो꣡षि꣢ । न꣣दनु꣢म् । सम् । ऊह꣣सि । आ꣢त् । इत् । पि꣣ता꣢ । इ꣣व । हूयसे ॥१३९०॥

Mantra without Swara
न की रेवन्तꣳ सख्याय विन्दसे पीयन्ति ते सुराश्वः । यदा कृणोषि नदनुꣳ समूहस्यादित्पितेव हूयसे ॥

न । किः । रेवन्तम् । सख्याय । स । ख्याय । विन्दसे । पीयन्ति । ते । सुराश्वः । यदा । कृणोषि । नदनुम् । सम् । ऊहसि । आत् । इत् । पिता । इव । हूयसे ॥१३९०॥

Samveda - Mantra Number : 1390
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे इन्द्र ! हे सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ! आप (रेवन्तम्) जिसके पास केवल धन है, दान, परोपकार आदि नहीं है, ऐसे मनुष्य को (सख्याय) मित्रता के लिए (न किः) कभी नहीं (विन्दसे) पाते हो। (ते) वे केवल धनवाले लोग (सुराश्वः) मदिरा-पान द्वारा प्रमत्त हुओं के समान धन के मद से प्रमत्त हुए (पीयन्ति) हिंसा करते हैं, सताते हैं। (यदा) जब, आप धनवान् को (नदनुम्) स्तोत्र नाद गुँजानेवाला स्तोता (कृणोषि) बनाते हो, तब (समूहसि) उसे उत्तम स्थिति प्राप्त करा देते हो, (आत् इत्) उसके अनन्तर उससे आप (पिता इव) पिता के समान (हूयसे) बुलाये जाते हो ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
Essence
धन पाकर जो लोग ऐश्वर्य के मद में मस्त नास्तिक होकर न सत्पात्रों में धन का दान करते हैं, न धर्माचार का सेवन करते हैं, न परमेश्वर को उपासते हैं, उनका धन धन नहीं, किन्तु उनके लिए मौत ही सिद्ध होता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा को संबोधन है।