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Samveda Mantra 1386

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्र꣡ सु꣢न्वा꣣ना꣡यान्ध꣢꣯सो꣣ म꣢र्तो꣣ न꣡ व꣢ष्ट꣣ त꣡द्वचः꣢꣯ । अ꣢प꣣ श्वा꣡न꣢मरा꣣ध꣡स꣢ꣳ ह꣣ता꣢ म꣣खं꣡ न भृग꣢꣯वः ॥१३८६॥

प्र꣢ । सु꣣न्वाना꣡य꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । म꣡र्तः꣢꣯ । न । व꣣ष्ट । त꣢त् । व꣡चः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । श्वा꣡न꣢꣯म् । अ꣣राध꣡स꣢म् । अ꣣ । राध꣡स꣢म् । ह꣣त꣢ । म꣣ख꣢म् । न । भृ꣡ग꣢꣯वः ॥१३८६॥

Mantra without Swara
प्र सुन्वानायान्धसो मर्तो न वष्ट तद्वचः । अप श्वानमराधसꣳ हता मखं न भृगवः ॥

प्र । सुन्वानाय । अन्धसः । मर्तः । न । वष्ट । तत् । वचः । अप । श्वानम् । अराधसम् । अ । राधसम् । हत । मखम् । न । भृगवः ॥१३८६॥

Samveda - Mantra Number : 1386
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
(अन्धसः) ब्रह्मानन्द-रूप सोमरस को (सुन्वानाय) अपने आत्मा के अन्दर प्रस्रुत करनेवाले मनुष्य के लिए (प्र) प्रशंसात्मक वचन कहो, (मर्तः) उससे भिन्न साधारण मनुष्य (तत् वचः) उस प्रशंसात्मक वचन का (न वष्ट) अधिकारी नहीं है। हे राज्याधिकारियो ! तुम (अराधसम्) परमेश्वर की आराधना न करनेवाले, (श्वानम्) श्वान के समान लोभ आदि में आसक्त, केवल पेट भरने में लगे हुए मनुष्य को (अपहत) विनष्ट कर दो, (भृगवः) सूर्य-किरणें (मखं न) जैसे व्याप्त अन्धकार को विनष्ट करती हैं ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
राज्याधिकारियों को चाहिए कि जो न परमेश्वर की आराधना करता है, न दीन जनों की सेवा करता है, केवल स्वार्थ-साधन में लगा हुआ पशुओं से भी अधिक निकृष्ट जीवन बिताता है, उसे यथायोग्य दण्डित करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५५३ क्रमाङ्क पर और उत्तरार्चिक में ७७४ क्रमाङ्क में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ उससे भिन्न व्याख्या प्रस्तुत है।