Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 138

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कुसीदी काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
दे꣣वा꣢ना꣣मि꣡दवो꣢꣯ म꣣ह꣡त्तदा वृ꣢꣯णीमहे व꣣य꣢म् । वृ꣡ष्णा꣢म꣣स्म꣡भ्य꣢मू꣣त꣡ये꣢ ॥१३८॥

दे꣣वा꣡ना꣢म् । इत् । अ꣡वः꣢꣯ । म꣣ह꣢त् । तत् । आ । वृ꣣णीमहे । वय꣢म् । वृ꣡ष्णा꣢꣯म् । अ꣣स्म꣡भ्य꣢म् । ऊ꣣त꣡ये꣢ ॥१३८॥

Mantra without Swara
देवानामिदवो महत्तदा वृणीमहे वयम् । वृष्णामस्मभ्यमूतये ॥

देवानाम् । इत् । अवः । महत् । तत् । आ । वृणीमहे । वयम् । वृष्णाम् । अस्मभ्यम् । ऊतये ॥१३८॥

Samveda - Mantra Number : 138
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
प्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। इन्द्र परमेश्वर है, उसके दिव्य सामर्थ्य देव हैं। (देवानाम्) इन्द्र परमेश्वर के दिव्य सामर्थ्यों का (इत्) ही (अवः) संरक्षण (महत्) महान् है। (वृष्णाम्) सुखों की वर्षा करनेवाले उन दिव्य सामर्थ्यों के (तत्) उस संरक्षण को (वयम्) हम उपासक लोग (ऊतये) प्रगति के प्राप्त्यर्थ (अस्मभ्यम्) अपने लिए (आवृणीमहे) प्राप्त करते हैं ॥ द्वितीय—विद्वानों के पक्ष में। इन्द्र आचार्य है, उसके विद्वान् शिष्य देव हैं। (देवानाम्) विद्वानों का (इत्) ही (अवः) शास्त्रज्ञान (महत्) विशाल होता है। (वृष्णाम्) विद्या की वर्षा करनेवाले उन विद्वानों के (तत्) उस शास्त्रज्ञान को (वयम्) हम अल्पश्रुत लोग (ऊतये) प्रगति के प्राप्त्यर्थ (अस्मभ्यम्) अपने लिए (आवृणीमहे) भजते हैं ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥४॥
Essence
इन्द्र नाम से वेदों में जिसकी कीर्ति गायी गयी है, उस परमेश्वर के दिव्य सामर्थ्य बहुमूल्य हैं, जिनका संरक्षण पाकर क्षुद्र शक्तिवाला मनुष्य भी सब विघ्नों और संकटों को पार करके विविध कष्टों से आकुल भी इस संसार में सुरक्षित हो जाता है। अतः परमेश्वर के दिव्य सामर्थ्यों का संरक्षण सबको प्राप्त करना चाहिए। साथ ही विद्वान् लोग भी देव कहलाते हैं। उनका उपदेश सुनकर ज्ञानार्जन भी करना चाहिए ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा से प्राप्तव्य रक्षण तथा विद्वानों से प्राप्तव्य ज्ञान की प्रार्थना करते हैं।