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Samveda Mantra 1377

1875 Mantra
Devata- आत्मा सूर्यो वा Rishi- सार्पराज्ञी Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣न्त꣡श्च꣢रति रोच꣣ना꣢꣫स्य प्रा꣣णा꣡द꣢पान꣣ती꣢ । व्य꣢꣯ख्यन्महि꣣षो꣡ दिव꣢꣯म् ॥१३७७

अ꣣न्त꣡रिति꣢ । च꣣रति । रोचना꣢ । अ꣣स्य꣢ । प्रा꣣णा꣢त् । प्र꣣ । आना꣢त् । अ꣣पानती꣢ । अ꣣प । अनती꣢ । वि । अ꣣ख्यत् । महिषः꣢ । दि꣡व꣢꣯म् ॥१३७७॥

Mantra without Swara
अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती । व्यख्यन्महिषो दिवम् ॥१३७७

अन्तरिति । चरति । रोचना । अस्य । प्राणात् । प्र । आनात् । अपानती । अप । अनती । वि । अख्यत् । महिषः । दिवम् ॥१३७७॥

Samveda - Mantra Number : 1377
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 3;

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Meaning
(अस्य) इस प्राणरूप सूर्य की (रोचना) दीप्ति अर्थात् प्रभावशक्ति (प्राणाद् अपानती) प्राणन-क्रिया के पश्चात् अपान की क्रिया करती हुई (अन्तः) शरीर के अन्दर (चरति) विचरण करती है। (महिषः) महान् प्राण (दिवम्) शरीर के मूर्धा को भी (व्यख्यत्) प्रकाशित करता है ॥२॥
Essence
जैसे बाह्य सौर जगत् में सूर्य ग्रह-उपग्रहों को धारण करता है,वैसे ही मानव- शरीर में जीवात्मासहित प्राण, मन, बुद्धि,मस्तिष्क, इन्द्रियों आदि को धारण करता है ॥२॥
Subject
द्वितीय ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ६३१ क्रमाङ्क पर सूर्य और परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ प्राणरूप सूर्य का वर्णन करते हैं।

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