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Samveda Mantra 1367

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प꣢रि꣣ प्र꣡ ध꣢न्वे꣡न्द्राय सोम स्वादुर्मित्राय पूष्णे भगाय ॥१३६७॥

प꣢रि꣣ । प्र꣡ । ध꣢न्व꣡ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सो꣣म । स्वादुः꣢ । मि꣣त्रा꣡य꣢ । मि꣣ । त्रा꣡य꣢꣯ । पू꣣ष्णे꣢ । भ꣡गा꣢꣯य ॥१३६७॥

Mantra without Swara
परि प्र धन्वेन्द्राय सोम स्वादुर्मित्राय पूष्णे भगाय ॥

परि । प्र । धन्व । इन्द्राय । सोम । स्वादुः । मित्राय । मि । त्राय । पूष्णे । भगाय ॥१३६७॥

Samveda - Mantra Number : 1367
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोम) ब्रह्मानन्दरस ! (स्वादुः) मधुर स्वादवाला तू (मित्राय) मित्र, (पूष्णे) पोषणकर्ता, (भगाय) सेवनीय (इन्द्राय) जीवात्मा के लिये(परि प्र धन्व) प्रवाहित हो ॥१॥
Essence
परमेश्वर के पास से प्रवाहित हुए परमानन्दरस का पान करके जीवात्मा में एक विलक्षण शक्ति उत्पन्न हो जाती है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ४२७ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ ब्रह्मानन्द का विषय कहते हैं।