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Samveda Mantra 1360

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रगाथो घौरः काण्वः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
मा꣡ चि꣢द꣣न्य꣡द्वि श꣢꣯ꣳसत꣣ स꣡खा꣢यो꣣ मा꣡ रि꣢षण्यत । इ꣢न्द्र꣣मि꣡त्स्तो꣢ता꣣ वृ꣡ष꣢ण꣣ꣳ स꣡चा꣢ सु꣣ते꣡ मुहु꣢꣯रु꣣क्था꣡ च꣢ शꣳसत ॥१३६०॥

मा꣢ । चि꣣त् । अन्य꣢त् । अ꣣न् । य꣢त् । वि । श꣣ꣳसत । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । मा꣢ । रि꣣षण्यत । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । इत् । स्तो꣣त । वृ꣡ष꣢꣯णम् । स꣡चा꣢꣯ । सु꣣ते꣢ । मु꣡हुः꣢꣯ । उ꣣क्था꣢ । च꣣ । शꣳसत ॥१३६०॥

Mantra without Swara
मा चिदन्यद्वि शꣳसत सखायो मा रिषण्यत । इन्द्रमित्स्तोता वृषणꣳ सचा सुते मुहुरुक्था च शꣳसत ॥

मा । चित् । अन्यत् । अन् । यत् । वि । शꣳसत । सखायः । स । खायः । मा । रिषण्यत । इन्द्रम् । इत् । स्तोत । वृषणम् । सचा । सुते । मुहुः । उक्था । च । शꣳसत ॥१३६०॥

Samveda - Mantra Number : 1360
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सखायः) साथियो ! तुम (अन्यत्) परमेश्वर के अतिरिक्त सूर्य, चाँद, वृक्ष, स्थाणु, प्रतिमा आदि को (मा चित्) कभी मत (विशंसत) पूजो, (मा रिषण्यत) अपूज्यों की पूजा से हानिग्रस्त मत होओ। (सुते) श्रद्धारस के अभिषुत होने पर (सचा) साथ मिलकर (वृषणम्) आनन्द की वर्षा करनेवाले (इन्द्रम् इत्) परमैश्वर्यशाली परमेश्वर की ही (स्तोत) स्तुति करो और (मुहुः मुहुः) बार-बार (उक्था च) स्तोत्रों का (शंसत) कीर्तन करो ॥१॥
Essence
एक सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, न्यायकारी परमेश्वर की ही पूजा सबको करनी चाहिए। वेदों में इन्द्र, मित्र, वरुण, आदि बहुत से नामों से एक ही परमेश्वर का प्रतिपादन हुआ है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २४२ क्रमाङ्क पर परमेश्वर की उपासना के विषय में की जा चुकी है। यहाँ भी वही विषय वर्णित है।