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Samveda Mantra 1356

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रगाथः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्व꣡मी꣢शिषे सु꣣ता꣢ना꣣मि꣢न्द्र꣣ त्व꣡मसु꣢꣯तानाम् । त्व꣢꣫ꣳ राजा꣣ ज꣡ना꣢नाम् ॥१३५६॥

त्वम् । ई꣣शिषे । सुता꣡ना꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯ । त्वम् । अ꣡सु꣢꣯तानाम् । अ । सु꣣तानाम् । त्व꣢म् । रा꣡जा꣢꣯ । ज꣡ना꣢꣯नाम् ॥१३५६॥

Mantra without Swara
त्वमीशिषे सुतानामिन्द्र त्वमसुतानाम् । त्वꣳ राजा जनानाम् ॥

त्वम् । ईशिषे । सुतानाम् । इन्द्र । त्वम् । असुतानाम् । अ । सुतानाम् । त्वम् । राजा । जनानाम् ॥१३५६॥

Samveda - Mantra Number : 1356
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) जगत् के रचयिता परमात्मन् ! (त्वम्) आप (सुतानाम्) उत्पन्न प्राणियों और पदार्थों के (ईशिषे) स्वमी हो, (त्वम्) आप ही (असुतानाम्) जो अभी उत्पन्न नहीं हुए, किन्तु भविष्य में उत्पन्न होनेवाले हैं, उन प्राणियों और पदार्थों के भी स्वामी हो। (त्वम्) आप ही (जनानाम्) मनुष्यों के (राजा) राजा हो ॥३॥
Essence
जीवात्मा के अन्दर जो महान् शक्ति निहित है, वह परमात्मा की ही दी हुई है, इस कारण परमात्मा की स्तुति से यहाँ जीव अपने अभिमान को दूर कर रहा है ॥३॥ यहाँ उपास्य-उपासक का सम्बन्ध वर्णित होने से, जीवात्मा को उद्बोधन होने से और विद्वान् उपासकों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ ग्यारहवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अब जीवात्मा परमात्मा की स्तुति करता है।