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Samveda Mantra 1354

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रगाथः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡ त्वा꣢ मन्दन्तु꣣ सो꣡माः꣢ कृणु꣣ष्व꣡ राधो꣢꣯ अद्रिवः । अ꣡व꣢ ब्रह्म꣣द्वि꣡षो꣢ जहि ॥१३५४॥

उ꣢त् । त्वा꣣ । मन्दन्तु । सो꣡माः꣢꣯ । कृ꣣णुष्व꣢ । रा꣡धः꣢꣯ । अ꣣द्रिवः । अ । द्रिवः । अ꣡व꣢꣯ । ब्र꣣ह्मद्वि꣡षः꣢ । ब्र꣣ह्म । द्वि꣡षः꣢꣯ । ज꣣हि ॥१३५४॥

Mantra without Swara
उ त्वा मन्दन्तु सोमाः कृणुष्व राधो अद्रिवः । अव ब्रह्मद्विषो जहि ॥

उत् । त्वा । मन्दन्तु । सोमाः । कृणुष्व । राधः । अद्रिवः । अ । द्रिवः । अव । ब्रह्मद्विषः । ब्रह्म । द्विषः । जहि ॥१३५४॥

Samveda - Mantra Number : 1354
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अद्रिवः) अविदारणीय बलवाले इन्द्र जीवात्मन् ! (त्वा) तुझे (सोमाः) वीर रस (मदन्तु उ) उत्साहित करें। तू (राधः) दिव्य ऐश्वर्य तथा सफलता को (कृणुष्व) उत्पन्न कर। (ब्रह्मद्विषः) ब्रह्मद्वेषी भावों को (अवजहि) विनष्ट कर दे ॥१॥
Essence
अपने आत्म-बल को पहचान कर मनुष्य को महान् कर्म करने चाहिएँ और विघ्नों को पराजित करना चाहिए ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में १९४ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में की गयी थी। यहाँ जीवात्मा को प्रोद्बोधन है।