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Samveda Mantra 1346

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यु꣣ङ्क्ष्वा꣢꣫ हि के꣣शि꣢ना꣣ ह꣢री꣣ वृ꣡ष꣢णा कक्ष्य꣣प्रा꣢ । अ꣡था꣢ न इन्द्र सोमपा गि꣣रा꣡मुप꣢꣯श्रुतिं चर ॥१३४६॥

युङ्क्ष्व꣢ । हि । के꣣शि꣡ना꣢ । हरी꣢꣯इ꣡ति꣢ । वृ꣡ष꣢꣯णा । क꣣क्ष्यप्रा꣢ । क꣣क्ष्य । प्रा꣢ । अ꣡थ꣢꣯ । नः꣣ । इन्द्र । सोमपाः । सोम । पाः । गिरा꣢म् । उ꣡प꣢꣯श्रुतिम् । उ꣡प꣢꣯ । श्रु꣣तिम् । चर ॥१३४६॥

Mantra without Swara
युङ्क्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा । अथा न इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर ॥

युङ्क्ष्व । हि । केशिना । हरीइति । वृषणा । कक्ष्यप्रा । कक्ष्य । प्रा । अथ । नः । इन्द्र । सोमपाः । सोम । पाः । गिराम् । उपश्रुतिम् । उप । श्रुतिम् । चर ॥१३४६॥

Samveda - Mantra Number : 1346
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 12;

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Meaning
हे (सोमपाः) सौम्य गुणों के रक्षक (इन्द्र) परमात्मन् ! जैसे आप (केशिना) सूर्य-किरणों से युक्त, (वृषणा) बलवान् (कक्ष्यप्रा) अपनी-अपनी भ्रमण-कक्षा में वेग से गति करते हुए (हरी) परस्पर आकर्षण से युक्त चन्द्रमा और भूमण्डल को आपस में जोड़ते हो, वैसे ही (केशिना) जीवात्मा के प्रकाश से युक्त, (कक्ष्यप्रा) अपने-अपने विषय की कक्षा में चलते हुए (हरी) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय रूप घोड़ों को (युङ्क्ष्व) परस्पर सहयोगवाला करो। (अथ) इस प्रकार (नः) हमारी (गिराम्) सब प्रार्थना-वाणियों की (उपश्रुतिम्) सुनवाई (चर) करो ॥३॥ यहाँ श्लिष्ट वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है ॥३॥
Essence
जैसे भूलोक और चन्द्रलोक एक-दूसरे के साथ सामञ्जस्य से वर्तमान हुए सूर्य का परिभ्रमण करते हैं, वैसे ही ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ आपस के सहयोग से मनुष्य का जीवन सञ्चालित करती हैं ॥३॥ इस खण्ड में अध्यात्म और राष्ट्र का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ दशम अध्याय में द्वादश खण्ड समाप्त ॥ दशम अध्याय समाप्त॥ पञ्चम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर से प्रार्थना की गयी है।

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